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Supreme Court Updates: मानव तस्करी मामले में केंद्र-राज्य सरकारों से मांगा जवाब; तमिलनाडु DGP को किया तलब

Sat, 28 Mar 2026 08:38 PM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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चुनावी प्रक्रिया में धांधली को रोकने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में दोहरी वोटिंग, पहचान बदलकर वोट डालने और फर्जी मतदाताओं द्वारा वोट डालने के मामलों का जिक्र किया गया है। याचिकाकर्ता ने आगामी विधानसभा चुनावों में मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आइरिस बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने के लिए चुनाव आयोग को निर्देश देने की मांग की है।
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यह जनहित याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है। संविधान के अनुच्छेद 32 का हवाला देते हुए याचिका में मौजूदा सुरक्षा उपायों के बावजूद रिश्वतखोरी, अनुचित प्रभाव, पहचान छिपाकर वोट डालना, दोहरी वोटिंग और फर्जी वोटिंग की निरंतर घटनाओं पर चिंता जताई गई है।

याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत से आग्रह किया है कि वह चुनाव आयोग को विशेष रूप से आगामी विधानसभा चुनावों में मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आइरिस-आधारित बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण शुरू करने का निर्देश दे। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक मतदाता ही वोट डाल सकें और एक नागरिक, एक वोट के सिद्धांत का कड़ाई से पालन हो।
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मौजूदा मतदाता पहचान प्रणाली की कमियां
याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान मतदाता पहचान विधियां, जो काफी हद तक मतदाता पहचान पत्र और मैन्युअल सत्यापन पर आधारित हैं, पुरानी तस्वीरों, लिपिकीय त्रुटियों और वास्तविक समय सत्यापन की कमी के कारण दुरुपयोग की संभावनाओं से ग्रस्त हैं। याचिका में कहा गया है कि बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जो अद्वितीय और गैर-डुप्लिकेट होता है, पहचान छिपाकर वोट डालने और कई बार वोट डालने जैसी समस्याओं को प्रभावी ढंग से समाप्त कर देगा।

चुनाव आयोग की शक्तियां और संवैधानिक दायित्व
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक जनादेश पर प्रकाश डालते हुए याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग के पास अनुच्छेद 324 के तहत ऐसी तकनीकी उपाय शुरू करने की पूर्ण शक्तियां हैं और वह मतदाता पहचान को मजबूत करने के लिए प्रासंगिक नियमों में संशोधन कर सकता है।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया है कि बायोमेट्रिक सत्यापन प्रवासी मतदाताओं, डुप्लिकेट चुनावी प्रविष्टियों और फर्जी मतदाताओं से संबंधित मुद्दों को हल करने में मदद कर सकता है। साथ ही चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए एक वास्तविक समय ऑडिट ट्रेल भी बना सकता है।

फर्जी बीमा पॉलिसी मामले में तमिलनाडु डीजीपी तलब, अदालत बोली-जांच की ऐसी समझ चिंताजनक
 सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मामलों में बीमा दस्तावेजों के सत्यापन में लापरवाही बरतने पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को 2 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। मामला नेशनल इंश्योरेंस कंपनी बनाम के. सरवनन से जुड़ा है। इसमें एक फर्जी बीमा पॉलिसी के आधार पर मुआवजा राशि का दावा किया गया था। न्यायालय की तरफ से पिछली सुनवाई में मांगे गए स्पष्टीकरण पर डीजीपी ने हलफनामा दायर कर कहा कि पुलिस जांच के दौरान केवल दस्तावेज एकत्र कर दावेदारों को सौंप देती है, लेकिन उनकी प्रमाणिकता की जांच बीमा कंपनियों से नहीं करती। इस पर पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पुलिस विभाग के मुखिया की जांच के प्रति यही समझ है तो यह विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने माना कि डीजीपी को उनके अधीनस्थों की तरफ से सही जानकारी नहीं दी गई। वहीं, पुलिस का पक्ष था कि वर्ष 2004 में यही स्थापित प्रक्रिया थी और बीमा कंपनी ने धोखाधड़ी की कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 2 अप्रैल को होगी।
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'मानव तस्करी के मामलों में क्या प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए', सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांगी जानकारी
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों को मानव तस्करी के मामलों में अपनाई जाने वाली मानक प्रक्रिया के बारे में जानकारी देने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उसे किसी काल्पनिक या अकादमिक प्रक्रिया में कोई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि एक व्यावहारिक दृष्टिकोण में रुचि है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने केंद्रीय गृह सचिव, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों को सभी हितधारकों के साथ चर्चा करने का निर्देश दिया। पीठ ने भारत सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे इस संबंध में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करें कि उनके अनुसार ऐसे मामलों में कौन सी मानक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि उसे एक ऐसी व्यावहारिक रणनीति में रुचि है जिसे उस स्थानीय पुलिस स्टेशन पर लागू किया जा सके, जिसके क्षेत्र में घटना घटित होती है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि मानव तस्करी, जिसमें बाल तस्करी भी शामिल है, के मामलों में समय का विशेष महत्व होता है। इसलिए, जो भी दिशा-निर्देश या सुझाव दिए जाएं, वे पुलिस की ओर से किसी व्यक्ति के लापता होने की शिकायत प्राप्त होने पर तुरंत की जाने वाली कार्रवाई की समयसीमा को ध्यान में रखते हुए होने चाहिए। पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार के निर्देशों पर केंद्र सरकार, बाकी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ओर से भी विचार किया जा सकता है। शीर्ष अदालत मानव तस्करी से संबंधित वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फूलका की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। नोटिस के बावजूद कुछ पुलिस महानिदेशकों के पेश न होने पर स्पष्टीकरण मांगा।
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