आरोपपत्र के सभी कॉलमों में स्पष्ट और पूर्ण प्रविष्टियां होनी जरूरी : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी की ओर से दायर आरोपपत्र में साक्ष्य की प्रकृति और मानक ऐसे होने चाहिए कि यदि साक्ष्य साबित हो जाए तो अपराध स्थापित हो जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने साथ ही कहा कि आरोपपत्र में सभी कॉलमों में स्पष्ट और पूर्ण प्रविष्टियां होनी चाहिए।
जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि एक संपूर्ण आरोपपत्र ऐसा होना चाहिए कि मुकदमा आरोपी या अभियोजन पक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना आगे बढ़ सके। पीठ ने कहा, आरोपपत्र में स्पष्ट किए जाने वाले सबूतों की प्रकृति और मानक को प्रथमदृष्टया यह दिखाना चाहिए कि यदि सामग्री और सबूत साबित हो जाते हैं तो अपराध स्थापित हो जाए। आरोपपत्र तब पूरा होता है जहां कोई मामला आगे के सबूतों पर निर्भर नहीं होता है। आरोपपत्र के साथ रिकॉर्ड पर रखे गए साक्ष्य और सामग्री के आधार पर ट्रायल होना चाहिए। पीठ दिल्ली में विवादित संपत्ति पर कई पक्षों की ओर से दायर मामलों से उत्पन्न अपीलों का निपटारा कर रही थी।
2जी स्पेक्ट्रम : शीर्ष कोर्ट ने केंद्र का आवेदन अस्वीकारा
सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले में केंद्र सरकार का आवेदन स्वीकार करने से मना कर दिया है। केंद्र ने ये आवेदन 2012 के फैसले पर स्पष्टीकरण के लिए दायर किया था। सरकार का कहना था कि ये फैसला कुछ स्थितियों में सार्वजनिक नीलामी के अलावा अन्य माध्यमों से स्पेक्ट्रम आवंटन पर रोक नहीं लगाता है। रजिस्ट्रार ने यह कहते हुए केंद्र का आवेदन खारिज कर दिया कि ये वास्तव में स्पष्टीकरण मांगने की आड़ में 2012 के फैसले की समीक्षा की मांग करता है। रजिस्ट्रार ने सुप्रीम कोर्ट के नियम, 2013 के प्रावधान के तहत इसे स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।
इस प्रावधान के अनुसार, रजिस्ट्रार किसी याचिका को इस आधार पर स्वीकार करने से इन्कार कर सकता है कि इसमें कोई उचित कारण नहीं बताया गया है। हालांकि याचिकाकर्ता ऐसे आदेश के 15 दिनों के भीतर प्रस्ताव के माध्यम से अपील कर सकता है। इस दौरान रजिस्ट्रार ने केंद्र के आवेदन दाखिल करने में करीब 12 वर्षों के अंतराल का भी हवाला दिया। इसके साथ ही यह भी नोट किया कि केंद्र सरकार ने 10 मई, 2012 को फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिका को खुद वापस ले लिया था।
रजिस्ट्रार ने कहा, आवेदन के जरिये लंबे समय के बाद फिर से खुली अदालत में मामले की दोबारा सुनवाई कराने का प्रयास किया जा रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में फरवरी, 2012 को दिए फैसले में 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन के लिए 'पहले आओ-पहले पाओ' आधार को रद्द कर दिया था।