बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अध्यक्ष मानन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान वकीलों से कथित मारपीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली पुलिस को जांच के निर्देश दिए। अदालत ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से कहा कि इस मामले में 22 अगस्त को दर्ज कराई गई शिकायत की जांच सुनिश्चित की जाए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की जांच के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अगुवाई में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि जांच पूरी होने के बाद संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट के सामने रिपोर्ट पेश की जाए।
यह आदेश दिल्ली हाईकोर्ट के 21 सितंबर के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। हाईकोर्ट ने वकीलों की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें कथित मारपीट की जांच सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग की गई थी।
बीसीआई कार्यालय के अंदर और बाहर मारपीट का आरोप
याचिकाकर्ता वकीलों ने आरोप लगाया था कि 20 और 21 अगस्त की दरमियानी रात बीसीआई कार्यालय के अंदर और बाहर उनके साथ तथा अन्य वकीलों के साथ मारपीट की गई थी। सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले में कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
उन्होंने कहा कि वकीलों ने 22 अगस्त को दिल्ली के आईपी एस्टेट थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को शिकायत दी थी, लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने पूछा कि क्या संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने निजी शिकायत दर्ज कराना बेहतर विकल्प नहीं होगा।
भूषण ने दलील दी कि किसी व्यक्ति के साथ मारपीट करना निश्चित रूप से संज्ञेय अपराध है। उन्होंने यह भी कहा कि बीसीआई को कथित मारपीट में शामिल वकीलों के खिलाफ पेशेवर कदाचार की कार्रवाई करनी चाहिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले में प्रतिवादियों को अभी नोटिस जारी नहीं किया गया है। हालांकि, घटना की उचित जांच सुनिश्चित करने और उसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश जारी किए।
पीठ ने कहा कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर 22 अगस्त को दी गई शिकायत की जांच सुनिश्चित करें और इसके लिए एसआईटी गठित की जाए। जांच दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच की मांग पर जताई थी असहमति
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस दलील पर असहमति जताई थी कि मानन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ दल से जुड़े सांसद हैं, इसलिए दिल्ली पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई नहीं करेगी और सीबीआई से जांच कराना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा था कि इस आशंका के समर्थन में कोई ठोस आधार पेश नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, बिना किसी विशिष्ट आधार के पूरे दिल्ली पुलिस बल की निष्पक्षता पर सवाल उठाना उचित नहीं है, खासकर तब जब याचिकाकर्ताओं के मामले में संज्ञेय अपराध बनना साबित नहीं हुआ था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सीबीआई भी एक सरकारी एजेंसी है। किसी सरकारी संस्था के खिलाफ सामान्य और आधारहीन आरोप लगाने से आम लोगों के मन में पूरी व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है। हाईकोर्ट ने वकीलों को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 के तहत शिकायत दर्ज कराने का वैकल्पिक उपाय भी बताया था।
बीसीआई के कामकाज पर सवाल उठाते हुए हुआ था प्रदर्शन
20 अगस्त को वकीलों के एक समूह ने दिल्ली में बीसीआई कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने संगठन के कामकाज में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए अध्यक्ष मानन कुमार मिश्रा के इस्तीफे की मांग की थी। प्रदर्शन के दौरान वकीलों ने एडवोकेट्स प्रोटेक्शन एक्ट लागू करने, सभी वकीलों के लिए बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराने और कानून कॉलेजों का नियमित व पारदर्शी निरीक्षण सुनिश्चित करने जैसी मांगें भी उठाई थीं।
इस प्रदर्शन का आह्वान ऑल इंडिया यंग एडवोकेट्स एसोसिएशन ने किया था और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने इसका समर्थन किया था।
एनएएलएसएआर के छात्रों से जुड़ा विवाद भी रहा चर्चा में
मानन कुमार मिश्रा इससे पहले एनएएलएसएआर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के छात्रों से जुड़े एक आदेश को लेकर भी विवाद में आए थे। उन्होंने विश्वविद्यालय के मौजूदा बैच के किसी भी स्नातक को वकील के रूप में नामांकित नहीं करने के लिए राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था। आलोचना के बाद यह आदेश वापस ले लिया गया था।
विवाद तब शुरू हुआ जब एनएएलएसएआर के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय के कुलपति, रजिस्ट्रार और प्रोफेसरों को पत्र लिखकर दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने के प्रस्ताव का विरोध किया था। पहले परिपत्र में मिश्रा ने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश के दीक्षांत समारोह में शामिल होने के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान से जुड़ी शिकायतों की जांच की जा रही है और जिम्मेदार लोगों की पहचान करने के लिए रिपोर्ट मांगी गई है।
कानूनी समुदाय के सदस्यों की आलोचना के बाद कुछ ही घंटों में फैसला बदल दिया गया। संशोधित आदेश में कहा गया कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों के कथित आचरण के लिए पूरे बैच को दंडित नहीं किया जाना चाहिए।