सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री ई.वी. वेलु को भ्रष्टाचार मामले में मिली अंतरिम राहत बरकरार रखते हुए मद्रास हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट के 9 जुलाई के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट पहले ही वेलु को जांच में शामिल होने का निर्देश दे चुका है। ऐसे में फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता। इसके बाद शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट में वेलु की ओर से कहा गया था कि वर्ष 2022 में उनके खिलाफ उस समय सड़क निर्माण के ठेकों में कथित अनियमितताओं की शिकायत दर्ज कराई गई थी, जब वह लोक निर्माण, राजमार्ग और लघु बंदरगाह मंत्री थे। उनके वकील ने दलील दी कि शिकायत दर्ज होने के बाद चार वर्षों तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई और सत्ता परिवर्तन के बाद अचानक कार्रवाई शुरू की गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजने में हुई देरी मात्र से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि इसके साथ एफआईआर के समय, तारीख या रिकॉर्ड में हेरफेर के ठोस संकेत भी हों, तो यह जांच की निष्पक्षता और एफआईआर की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी 1977 के उत्तर प्रदेश के गोंडा हत्याकांड में दोषी ठहराए गए पांच आरोपियों को बरी करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मामले में एफआईआर दो दिन बाद मजिस्ट्रेट के पास भेजी गई, पोस्टमार्टम में भी करीब दो दिन की देरी हुई और इसका संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। इसके अलावा घटनास्थल पर पूरी रात शव का बिना सुरक्षा के पड़े रहना, एफआईआर दर्ज कराने कौन-कौन पुलिस स्टेशन गया, इस पर गवाहों और जनरल डायरी में विरोधाभास तथा जांच में कई अन्य असंगतियां सामने आईं। अदालत ने कहा कि इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने पर अभियोजन की कहानी संदेहास्पद हो जाती है और आरोप संदेह से परे साबित नहीं होते, इसलिए दोषसिद्धि रद्द करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया।