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SC Updates: स्टेन्स हत्याकांड में ओडिशा सरकार को 'सुप्रीम' निर्देश; पूर्व मंत्री वेलु को सुप्रीम कोर्ट से राह

Wed, 15 Jul 2026 03:13 PM IST
Pavan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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सुप्रीम कोर्ट ने ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या के दोषी रवींद्र पाल उर्फ दारा सिंह की समय से पहले रिहाई (रिमिशन) की याचिका पर ओडिशा सरकार को 15 अगस्त तक फैसला लेने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की सजा समीक्षा समिति एक महीने के भीतर इस मामले में निर्णय ले। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि समिति जरूरी रिकॉर्ड मिलने के बाद जल्द फैसला करे। मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
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दारा सिंह ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि वह 24 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है और अपने किए पर पछता रहा है। उसने अदालत से कहा कि अगर उसे रिहा किया जाता है तो वह समाज की सेवा करेगा। उसने ओडिशा सरकार की 2022 की समयपूर्व रिहाई नीति के तहत अपने मामले पर विचार करने की मांग की है। 23 जनवरी 1999 की रात दारा सिंह के नेतृत्व में भीड़ ने ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में ग्राहम स्टेन्स और उनके आठ व 11 साल के दो बेटों को उनकी गाड़ी समेत जिंदा जला दिया था। इस मामले में दारा सिंह को पहले फांसी की सजा मिली थी, जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया था।

 
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छत्तीसगढ़ डीएमएफ घोटाला: कथित सरगना सतपाल सिंह छाबड़ा को जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) घोटाले में आरोपी और कथित सरगना सतपाल सिंह छाबड़ा को जमानत दे दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने यह आदेश सुनाया। सुनवाई के दौरान छाबड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने कहा कि इस मामले में कई सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। इनमें छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी अनिल टूटेजा भी शामिल हैं। अदालत ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए छाबड़ा को भी राहत दे दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छाबड़ा को ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के अनुसार जमानत बांड भरना होगा। ट्रायल कोर्ट जरूरत पड़ने पर अन्य शर्तें भी लगा सकता है। प्रवर्तन एजेंसियों के अनुसार, सतपाल सिंह छाबड़ा पर डीएमएफ के तहत ठेके दिलाने के बदले करीब पांच करोड़ रुपये की अवैध रिश्वत लेने का आरोप है। डीएमएफ की राशि खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास और वहां रहने वाले लोगों के कल्याण के लिए खर्च की जाती है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि इस धन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी और भ्रष्टाचार किया गया। इससे पहले अनिल टूटेजा को भी मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है।
 

पूर्व मंत्री ई.वी. वेलु को सुप्रीम कोर्ट से राहत

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री ई.वी. वेलु को भ्रष्टाचार मामले में मिली अंतरिम राहत बरकरार रखते हुए मद्रास हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट के 9 जुलाई के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट पहले ही वेलु को जांच में शामिल होने का निर्देश दे चुका है। ऐसे में फिलहाल हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं बनता। इसके बाद शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर दखल देने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट में वेलु की ओर से कहा गया था कि वर्ष 2022 में उनके खिलाफ उस समय सड़क निर्माण के ठेकों में कथित अनियमितताओं की शिकायत दर्ज कराई गई थी, जब वह लोक निर्माण, राजमार्ग और लघु बंदरगाह मंत्री थे। उनके वकील ने दलील दी कि शिकायत दर्ज होने के बाद चार वर्षों तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई और सत्ता परिवर्तन के बाद अचानक कार्रवाई शुरू की गई।
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जांच में गंभीर खामियां मिलने पर पांच आरोपी बरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एफआईआर को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजने में हुई देरी मात्र से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि इसके साथ एफआईआर के समय, तारीख या रिकॉर्ड में हेरफेर के ठोस संकेत भी हों, तो यह जांच की निष्पक्षता और एफआईआर की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह पैदा करता है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह टिप्पणी 1977 के उत्तर प्रदेश के गोंडा हत्याकांड में दोषी ठहराए गए पांच आरोपियों को बरी करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मामले में एफआईआर दो दिन बाद मजिस्ट्रेट के पास भेजी गई, पोस्टमार्टम में भी करीब दो दिन की देरी हुई और इसका संतोषजनक कारण नहीं बताया गया। इसके अलावा घटनास्थल पर पूरी रात शव का बिना सुरक्षा के पड़े रहना, एफआईआर दर्ज कराने कौन-कौन पुलिस स्टेशन गया, इस पर गवाहों और जनरल डायरी में विरोधाभास तथा जांच में कई अन्य असंगतियां सामने आईं। अदालत ने कहा कि इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने पर अभियोजन की कहानी संदेहास्पद हो जाती है और आरोप संदेह से परे साबित नहीं होते, इसलिए दोषसिद्धि रद्द करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया।
 
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