सुप्रीम कोर्ट ने आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल (आईटीएटी) में कर्मचारियों और सदस्यों के रिक्त पदों को लेकर दायर एक याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। न्यायालय ने उच्च न्यायालयों से आवश्यकतानुसार न्यायिक अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने का भी निर्देश दिया है।
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प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और इस मामले में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से सहायता मांगी। न्यायालय ने कहा कि लंबित पदों को जल्द से जल्द भरने के लिए याचिका की प्रति अटॉर्नी जनरल के कार्यालय को सौंपी जाए। एक अंतरिम उपाय के रूप में ट्रिब्यूनल उच्च न्यायालयों से ऐसे न्यायिक अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने का अनुरोध कर सकते हैं, जिन्हें वहां से मुक्त किया जा सके।
यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसे आईटीएटी के पूर्व उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार बंसल ने दायर किया था। याचिका में ट्रिब्यूनल में रिक्तियों का जिक्र किया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने पीठ को बताया कि रजिस्ट्रार सहित सभी अधिकारियों के पद कई वर्षों से खाली पड़े हैं। इस पर न्यायालय ने आश्चर्य जताया कि ये पद इतने लंबे समय से रिक्त क्यों हैं और आश्वासन दिया कि इस मामले को प्रशासनिक पक्ष से देखा जाएगा।
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कर्नाटक में विधायकों-MLC को कैबिनेट दर्जा देने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार के 42 विधायकों (जिनमें एमएलसी भी शामिल हैं) को विभिन्न बोर्डों और निगमों के प्रमुख के रूप में कैबिनेट दर्जा देने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट में एक समीक्षा याचिका दायर करने की सलाह दी है।
प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, "हम याचिकाकर्ता को उच्च न्यायालय में एक समीक्षा याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ इस याचिका का निपटारा करते हैं।" पीठ ने याचिकाकर्ता को यह निर्देश देते हुए मामले को समाप्त कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने पीठ ने दलील दी कि इस मामले को वह गंभीरता नहीं मिली, जिसकी अपेक्षा उच्च न्यायालय से थी। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित विभाग के पास अपना कोई धन नहीं है, क्योंकि यह भारत के समेकित कोष से आता है।
यह मामला कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ काम करने वाले सूरी पायला द्वारा दायर अपील पर सुना जा रहा था। पायला ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के चार मार्च के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित में नहीं है, बल्कि याचिकाकर्ता की कुछ पदों के लिए महत्वाकांक्षाओं से भी प्रेरित है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को मुकदमे में अपने संभावित हित का खुलासा करना आवश्यक है, जिसमें याचिकाकर्ता विफल रहा।
याचिका में तर्क दिया गया था कि इन विधायकों को कैबिनेट का दर्जा देने से उच्च वेतन, आधिकारिक वाहन, चालक, ईंधन भत्ता, मकान किराया भत्ता (एचआरए) और चिकित्सा प्रतिपूर्ति जैसे वित्तीय लाभ प्राप्त होते हैं। याचिका में कहा गया था कि यह "लाभ का पद" है और संविधान के अनुच्छेद 191 का उल्लंघन करता है, जो विधायकों को ऐसे पद धारण करने से अयोग्य ठहराता है।
आर्द्रभूमि की अस्पष्ट परिभाषा पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत 'आर्द्रभूमि' की परिभाषा को अस्पष्ट बताया गया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने भारत संघ और राष्ट्रीय आर्द्रभूमि समिति को नोटिस जारी किया है और 10 अगस्त तक उनके जवाब मांगे हैं। पीठ ने कहा, "हम अपने नोटिस को परिभाषा की अस्पष्टता तक सीमित रख रहे हैं।"
शीर्ष अदालत ने यह नोटिस जीवविज्ञानी रवींद्र सिन्हा और अन्य द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई पर जारी किया। याचिका में आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत 'आर्द्रभूमि' की परिभाषा की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियमों के नियम 2(जी) में 'आर्द्रभूमि' को दलदल, पीटभूमि, या जल क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है, चाहे वह प्राकृतिक हो या कृत्रिम, स्थायी हो या अस्थायी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियमों ने आर्द्रभूमियों को मिलने वाली सुरक्षा को कमजोर किया है। उन्होंने कहा कि इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील स्थलों को नियामक सुरक्षा उपायों से बाहर रखा गया है और 99 स्थलों में से 44 नियामक सुरक्षा उपायों से बाहर हो गए हैं।
याचिका में तर्क दिया गया है कि नियम 2(जी) का बहिष्कृत भाग नदी चैनलों, धान के खेतों, मानव निर्मित जल निकायों या पीने के पानी के उद्देश्यों के लिए निर्मित टैंकों, और एक्वाकल्चर, नमक उत्पादन, मनोरंजन और सिंचाई के लिए बनाए गए ढांचों को बाहर करके प्रभावी रूप से कई आर्द्रभूमियों से सुरक्षा छीन लेता है। याचिका में नियम 2(जी) के इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के विपरीत घोषित करने की मांग की गई है।
1983 के सामूहिक हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में वर्ष 1983 में हुए पांच लोगों की हत्या के चर्चित मामले में दोषियों की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि इस घटना की बर्बरता न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर देने वाली है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि इस मामले में किसी भी प्रकार की नरमी या गलत सहानुभूति की कोई गुंजाइश नहीं है।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के वर्ष 2017 के फैसले को सही ठहराते हुए दोषियों की उम्रकैद की सजा को कायम रखा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मार्च 1983 में होली के दिन कम से कम 58 लोगों की भीड़ ने मुजफ्फरपुर के एक गांव में चंद्रशेखर चौधरी के घर को चारों तरफ से घेर लिया था।
भीड़ हथियारों से लैस थी और पहले घर में आग लगाई गई। इसके बाद जान बचाकर भाग रहे परिवार के सदस्यों पर हमला किया गया। इस हिंसा में एक ही परिवार के पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि कई महिलाएं और बच्चे गंभीर रूप से घायल हुए थे।