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Supreme Court: 'राज्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए बाध्य नहीं कर सकते', सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

Sat, 10 May 2025 09:21 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 द्वारा प्रस्तावित तीन-भाषा फॉर्मूले को तमिलनाडु, केरल और बंगाल में लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। जस्टिस जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर विचार करने से इन्कार करते हुए कहा कि अदालत किसी राज्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जैसी नीति अपनाने के लिए सीधे तौर पर बाध्य नहीं कर सकती।
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हालांकि, अगर राष्ट्रीय शिक्षा नीति से संबंधित राज्य की कार्रवाई या निष्क्रियता किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। हम इस रिट याचिका में इस मुद्दे की जांच करने का प्रस्ताव नहीं रखते हैं। यह याचिका भाजपा के वकील जीएस मणि ने दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शैक्षिक नीति को लागू करने या समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने से राज्य सरकार का इन्कार जनहित को नुकसान पहुंचा सकती है या नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है।

नहीं माना मौलिक अधिकार का उल्लंघन
याचिका में राज्य सरकारों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने और एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी, जिसमें मौलिक लोक कल्याण और शिक्षा के अधिकार, सांविधानिक अधिकार, या सरकारी दायित्वों को नजरअंदाज किया जा रहा है या उनका उल्लंघन किया जा रहा है।
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विधि पाठ्यक्रम की समीक्षा संबंधी अर्जी लंबित याचिका से जोड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने देश में पांच वर्षीय विधि पाठ्यक्रमों की समीक्षा के लिए विधि शिक्षा आयोग या विशेषज्ञ समिति के गठन के अनुरोध से संबंधित जनहित याचिका को लंबित याचिका के साथ जोड़ने का आदेश दिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने नोटिस जारी करने से इन्कार करते हुए एक याचिका के साथ सुनवाई पर सहमति जताई। पीठ ने कहा हम इस याचिका को दूसरी याचिका से जोड़ेंगे।

87 में से 71 गवाहों के मुकरने पर 6 हत्यारोपियों को मिली सुप्रीम रिहाई
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में मृतक पिता के बेटे समेत 87 में से 71 गवाहों के मुकर जाने पर छह हत्यारोपियों को बरी कर दिया। शीर्ष अदालत कर्नाटक हाईकोर्ट के 27 सितंबर, 2023 के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए इस मामले में छह आरोपियों को दोषी ठहराया था।

जस्टिस सुधांशु धूलिया व जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने 49 पन्नों के फैसले में कहा, अनसुलझे अपराध के लिए भारी मन से, लेकिन आरोपियों के खिलाफ सबूतों की कमी के मुद्दे पर संदेह नहीं होने के कारण, हम आरोपियों को बरी करते हैं। हम हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बहाल करते हैं। पीठ ने गवाहों के मुकर जाने और अति उत्साही जांच पर अफसोस जताया। पीठ ने कहा कि जांच में आपराधिक कानून के बुनियादी सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी की गई। ऐसी अनदेखी अक्सर मजाक बनकर रह जाता है।

यह एक क्लासिक मामला
पीठ ने कहा, यह एक क्लासिक मामला है। गवाह पिछले बयानों से मुकर जाते हैं, बरामदगी से इन्कार करते हैं और चश्मदीद गवाह अंधे हो जाते हैं। कुल 87 में से 71 गवाह मुकर गए। इससे अभियोजन पक्ष को पुलिस और सरकारी गवाहों की गवाही पर ही टिके रहना पड़ा। यहां तक कि एक युवक, जो महत्वपूर्ण चश्मदीद गवाह है। जिसने अपने पिता को मौत के घाट उतारते हुए देखा, हमलावरों की पहचान करने में विफल रहा। 

तत्काल टिकट बुकिंग पर सुप्रीम सुनवाई से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र को आईआरसटीसी तत्काल बुकिंग सिस्टम की गहन जांच करने का निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायत के साथ अधिकार क्षेत्र वाले हाईकोर्ट में जा सकते हैं।

पीठ ने कहा कि वह याचिका के गुण-दोष पर टिप्पणी नहीं कर रही है। याचिका में संबंधित अधिकारियों को भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम की तत्काल बुकिंग प्रणाली का गहन ऑडिट कराने का निर्देश देने की मांग की गई है। अधिकारियों को सख्त साइबर सुरक्षा उपायों को लागू करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है, ताकि अवैध एजेंटों और दलालों को स्वचालित बॉट्स और अवैध सॉफ्टवेयर प्रोग्राम के माध्यम से तत्काल बुकिंग प्रणाली में हेरफेर करने से रोका जा सके। बता दें कि ट्रेन यात्रा से एक दिन पहले तत्काल टिकट बुक किए जा सकते हैं। 

याचिकाओं को सरल व संक्षिप्त बनाने की जरूरत : सीजेआई
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने न्यायिक कार्यवाही में याचिकाओं को सरल और संक्षिप्त बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि याचिकाओं की ड्राफ्टिंग यानी मसौदा तैयार करने की कला में महारत हासिल करने के लिए बहुत प्रयास करने की आवश्यकता है।

अगले सप्ताह सेवानिवृत्त होने जा रहे सीजीआई ने कहा कि 'कम ही ज्यादा है' यानी चीजों को सरल रखने के सिद्धांत को अपनाने की आवश्यकता है, क्योंकि याचिकाओं में स्पष्टता वकीलों और न्यायाधीशों दोनों के लिए लाभदायक है। वह सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) की ओर से उन्हें विदाई देने के लिए आयोजित एक समारोह में बोल रहे थे। वह 13 मई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। सीजेआई पद के लिए मनोनीत जस्टिस बीआर गवई ने भी सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सीजेआई खन्ना अपने कार्यकाल के दौरान पारदर्शिता और समावेशिता लेकर आए।

जस्टिस गवई 14 मई को 52वें सीजेआई के रूप में शपथ लेंगे। सीजेआई खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड के महत्व के बारे में बताया और कहा कि वे न केवल सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता हैं, बल्कि देश भर के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा, एक चीज जो मुझे अभी भी महसूस होती है कि हम वास्तव में नहीं सीख पाए हैं, वह है ड्राफ्टिंग की कला। आप जितना कम बोलेंगे, याचिकाएं जितनी छोटी होंगी, याचिकाएं जितनी स्पष्ट होंगी, यह आपके और न्यायाधीशों दोनों के लिए कहीं अधिक लाभकारी होगा।
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ऑपरेशन सिंदूर के नाम पर न हो ट्रेडमार्क का पंजीकरण
उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर कर प्राधिकारियों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वे ऑपरेशन सिंदूर नाम से ट्रेडमार्क के पंजीकरण की अनुमति न दें। याचिका में कहा गया है कि इसका व्यावसायिक उपयोग के लिए दुरुपयोग नहीं होने दिया जाना चाहिए। देव आशीष दुबे ने  सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में कहा गया कि पांच व्यक्तियों ने वर्ग 41 के तहत आवेदन दायर किया है।  अइसमें शिक्षा और मनोरंजन जैसी सेवाएं शामिल हैं, तथा संबंधित ट्रेडमार्क रजिस्ट्री में ऑपरेशन सिंदूर नाम और शैली के तहत ट्रेडमार्क पंजीकरण के लिए आवेदन किया है। याचिका में कहा गया है कि ऑपरेशन सिंदूर में न केवल देश के लोगों की भावनाएं शामिल हैं, बल्कि उन लोगों की भी भावनाएं शामिल हैं जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है और 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम आतंकवादी हमले में निर्दोष नागरिकों की तत्काल हत्या से देशव्यापी आक्रोश भड़क गया है।
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