ग्रीन नॉर्म्स पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को राहत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही 16 मई 2025 के उस आदेश को बहुमत से वापस ले लिया, जिसमें केंद्र को पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी (पोस्ट-फैक्टो EC) देने से रोका गया था। अदालत ने कहा कि मामले की व्यापक समीक्षा जरूरी है, क्योंकि इसे लागू करने से कई चल रही सार्वजनिक परियोजनाएं प्रभावित होंगी।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस उज्जल भुयान की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने अलग-अलग फैसले सुनाए। बहुमत में मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस चंद्रन थे, जिन्होंने मई के आदेश को वापस लेते हुए कहा कि पूर्वव्यापी मंजूरी पर रोक से करीब 20,000 करोड़ रुपये की सार्वजनिक परियोजनाएं ध्वस्त करनी पड़ सकती हैं। उन्होंने मामले को नई पीठ के पास भेजने का आदेश दिया। वहीं जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने इससे असहमति जताई और कहा कि ऐसी मंजूरियां पर्यावरण कानून के लिए ‘अभिशाप’ हैं।
क्यों हुआ विवाद?
विवाद की जड़ 2017 की अधिसूचना और 2021 के कार्यालय ज्ञापन थे, जिनके तहत उन परियोजनाओं को भी मंजूरी दी जाती थी, जिन्होंने कार्य शुरू होने के बाद पर्यावरणीय मानदंडों को पूरा किया। मई 2025 के आदेश में तत्कालीन पीठ जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस भुयान ने ऐसे प्रावधानों को रद्द कर दिया था और सरकार को काम के बाद मंजूरी देने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद लगभग 40 समीक्षा और संशोधन याचिकाएं दाखिल हुईं, जिन पर अब सुप्रीम कोर्ट ने नया रास्ता खोल दिया।
जस्टिस भुयान की कड़ी आपत्ति
जस्टिस उज्ज्वल भुयान ने स्पष्ट कहा कि पर्यावरण कानून में पूर्वव्यापी मंजूरी की कोई अवधारणा नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एहतियाती सिद्धांत और सतत विकास का मूल सिद्धांत यही है कि किसी भी परियोजना को काम शुरू करने से पहले EC लेना अनिवार्य है। उन्होंने चेतावनी दी कि पोस्ट-फैक्टो मंजूरी देना पर्यावरणीय न्यायशास्त्र की भावना को खत्म कर देता है और इसे अज्ञात और खतरनाक चलन बताया।
सरकार का पक्ष और अदालत की चिंता
बहुमत वाले फैसले में मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि सख्त रोक लगाने से न केवल सार्वजनिक परियोजनाओं पर असर पड़ेगा, बल्कि उन सरकारी संसाधनों पर भी सवाल उठेंगे जो पहले से खर्च किए जा चुके हैं। अदालत ने कहा कि न्यायिक समीक्षा जरूरी है, लेकिन उन परियोजनाओं को अचानक अवैध घोषित करना व्यावहारिक नहीं होगा, जिनमें बड़ी सार्वजनिक पूंजी लगी है। इससे राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे पर व्यापक असर पड़ सकता है।
वकीलों के कॉलर बैंड पर 'सुप्रीम' बहस: अदालत ने खारिज की याचिका, कहा- मामला हस्तक्षेप योग्य नहीं
देश की सर्वोच्च अदालत ने वकीलों द्वारा इस्तेमाल के बाद फेंके जाने वाले एडवोकेट बैंड को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सख्त रुख दिखाते हुए मंगलवार को इसे खारिज कर दिया। याचिका में मांग की गई थी कि पूरे देश के सभी कोर्ट परिसरों में वकीलों के सफेद बैंड के लिए एक समान और पर्यावरण अनुकूल डिस्पोजल सिस्टम बनाया जाए। अदालत ने साफ किया कि यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा से बाहर है।
मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल की एसोसिएट प्रोफेसर साक्षी विजय की याचिका को सुनवाई के बाद खारिज करते हुए कहा कि अदालत यह तय नहीं कर सकती कि वकीलों के बैंड कैसे इस्तेमाल या नष्ट किए जाएं। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में अदालतें कदम बढ़ाने लगेंगी तो इसका कोई अंत नहीं होगा।
याचिकाकर्ता ने दलीली में क्या कहा?
याचिकाकर्ता साक्षी विजय ने अपनी दलील में कहा कि उन्होंने अपने घर में कई पुराने एडवोकेट बैंड पड़े देखे, जिन्हें न तो दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता था और न ही पर्यावरण के अनुकूल तरीके से नष्ट किया जा सकता था। उन्होंने बताया कि कई कोर्ट परिसरों के पास गड्ढों, कूड़ेदानों और रास्तों के किनारे सिंथेटिक बैंड फेंके हुए दिखते हैं, जिन्हें वकील अक्सर एक बार इस्तेमाल करके छोड़ देते हैं।
कोर्ट परिसरों में कचरे की समस्या की बात
याचिका में कहा गया था कि इन बैंड में इस्तेमाल होने वाली सिंथेटिक सामग्री पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती है। कई जगहों पर बैंड खुले में पड़े रहते हैं और इससे कोर्ट परिसरों में स्वच्छता पर भी असर पड़ता है। याचिकाकर्ता का कहना था कि अदालत एक ऐसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे ताकि वकील अपने पुराने बैंड को निर्धारित स्थान पर जमा कर सकें।
पीठ ने इन दलीलों को सुनने के बाद कहा कि यह मुद्दा अदालत के हस्तक्षेप योग्य नहीं है और इस संबंध में नीति बनाना सरकार या संबंधित संस्थाओं का काम है। अदालत ने कहा कि इस तरह के छोटे प्रशासनिक मामलों को अदालत के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और आगे कोई दिशा-निर्देश जारी करने से इनकार कर दिया।