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Supreme Court: कल्लाकुरिची जहरीली शराबकांड में स्टालिन सरकार को 'सुप्रीम' झटका; CBI जांच के खिलाफ याचिका खारिज

Wed, 18 Dec 2024 06:33 PM IST
अभिषेक दीक्षित पीटीआई, नई दिल्ली

सार

हाईकोर्ट ने अन्नाद्रमुक के विधिक प्रकोष्ठ के सचिव और पूर्व विधायक आई एस इन्बादुरई, ‘एडवोकेट्स फोरम फॉर सोशल जस्टिस’ के अध्यक्ष के. बालू तथा दो अन्य की याचिकाओं पर 20 नवंबर को आदेश सुनाया था। याचिकाकर्ताओं ने जहरीली शराब कांड की सीबीआई जांच की मांग की थी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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कल्लाकुरिची जहरीली शराब कांड की सीबीआई जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट से तमिलनाडु सरकार को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनकी उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें जहरीली शराब कांड की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जांच को चुनौती दी गई थी। याचिका में मामले की जांच सीबीआई को सौंपने के मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। घटना में जहरीली शराब पीकर 67 लोगों की मौत हो गई थी।

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जस्टिस जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने मंगलवार को कहा कि वह हाईकोर्ट के आदेश में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। पीठ ने कहा, 'याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद हमें हाईकोर्ट के तर्कसंगत फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई उचित कारण नहीं नजर आता। इसलिए विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज की जाती हैं।'

हाईकोर्ट ने 20 नवंबर को आदेश सुनाया था
इससे पहले हाईकोर्ट ने अन्नाद्रमुक के विधिक प्रकोष्ठ के सचिव और पूर्व विधायक आई एस इन्बादुरई, ‘एडवोकेट्स फोरम फॉर सोशल जस्टिस’ के अध्यक्ष के. बालू तथा दो अन्य की याचिकाओं पर 20 नवंबर को आदेश सुनाया था। याचिकाकर्ताओं ने जहरीली शराब कांड की सीबीआई जांच की मांग की थी।
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कोर्ट ने क्या कहा था?
कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई को मामलों के हस्तांतरण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के संदर्भ में हमारा प्रथम दृष्टया विचार है कि यह कल्लाकुरिची शराब त्रासदी मामला दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों में से एक है, जिसके लिए सीबीआई की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। कोर्ट ने तमिलनलाडु पुलिस को सीबी-सीआईडी (विल्लुपुरम) के पास से मामलों से जुड़ी पूरी केस डायरी दो सप्ताह में सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया था।

तीनों मामलों में जांच का निर्देश दिया था
हाईकोर्ट ने सीबीआई (चेन्नई) को इस संबंध में दर्ज तीनों मामलों में जांच का निर्देश दिया था। कोर्ट ने उसे यह निर्देश भी दिया था कि वह तीनों मामलों के सभी पहलुओं की जांच करे और जल्द से जल्द संबंधित अदालत के समक्ष अंतिम रिपोर्ट दाखिल करे।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
पीएफआई सदस्य को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली
सुप्रीम कोर्ट ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के एक कथित सदस्य को जमानत देते हुए कहा कि उसे बिना मुकदमे के अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रहने दिया जा सकता। न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मंगलवार को कहा कि संरक्षित गवाहों के बयान में ऐसी कोई विशेष बात नहीं कही गई है, जिससे आरोपी पर प्रथम दृष्टया गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम के तहत आरोप लगाया जा सके।

पीठ ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुकदमा जल्द पूरा होने की संभावना नहीं है, और जैसा कि इस अदालत के विभिन्न निर्णयों में निर्धारित किया गया है कि अपीलकर्ता को अनिश्चित काल तक जेल में रहने नहीं दिया जा सकता और वह भी बिना मुकदमे के। यदि ऐसा होने दिया जाता है तो यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा।

अपील को स्वीकार करते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को विशेष अदालत द्वारा तय की जाने वाली उचित शर्तों पर जमानत दी जानी चाहिए। अपीलकर्ता को मंगलवार से अधिकतम सात दिन के अंदर विशेष अदालत के समक्ष पेश किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि विशेष अदालत प्रतिवादी के वकील की दलीलें सुनने के बाद मुकदमे के समापन तक, अपीलकर्ता को उचित शर्तों पर जमानत पर रिहा करेगी।

क्या है आरोप?
पीठ जुलाई 2022 में गिरफ्तार किए गए अतहर परवेज नामक व्यक्ति की अपील पर सुनवाई कर रही थी। परवेज ने मामले में जमानत देने से इनकार करने के पटना उच्च न्यायालय के नवंबर 2023 के आदेश को चुनौती दी है। परवेज पर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित पटना यात्रा के दौरान अशांति उत्पन्न करने की योजना बनाने का आरोप है।

हाईकोर्ट के रिटायर्ड जजों की पेंशन देखकर चौंका सुप्रीम कोर्ट, बताया दयनीय

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि यह 'दयनीय' है कि उच्च न्यायालय के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 10 से 15 हजार रुपये पेंशन मिल रही है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा, 'आप हर मामले में कानूनी दृष्टिकोण नहीं अपना सकते। कभी-कभी आपको मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होती है।'

उच्च न्यायालय के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 10,000 से 15,000 रुपये के बीच पेंशन मिलने की बात पर गौर करते हुए पीठ ने कहा, 'यह दयनीय है।' उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की पेंशन से संबंधित एक याचिका बुधवार को पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थी। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया और अनुरोध किया कि इस पर जनवरी में सुनवाई की जाए।

वेंकटरमणी ने कहा कि सरकार इस मुद्दे को सुलझाने का प्रयास करेगी। पीठ ने कहा, 'बेहतर होगा कि आप उन्हें (सरकार को) समझाएं कि (इस मामले में) हमारे हस्तक्षेप से बचा जाए तो बेहतर है।' पीठ ने कहा कि मामले का फैसला व्यक्तिगत मामलों के आधार पर नहीं किया जाएगा और शीर्ष अदालत जो भी आदेश देगी, वह सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर लागू होगा।

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई के लिए आठ जनवरी की तारीख तय की।

पिछले महीने इस मामले में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि उच्च न्यायालय के कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 6,000 से 15,000 रुपये के बीच मामूली पेंशन मिल रही है। पीठ उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। न्यायाधीश ने कहा था कि उन्हें 15,000 रुपये पेंशन मिल रही है। याचिकाकर्ता, जिला अदालत में 13 साल तक न्यायिक अधिकारी के रूप में सेवा देने के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि अधिकारियों ने पेंशन की गणना करते समय उनकी न्यायिक सेवा पर विचार करने से इनकार कर दिया था।

पीठ ने कहा था, 'हमारे सामने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं, जिन्हें 6,000 रुपये और 15,000 रुपये पेंशन मिल रही है, जो चौंकाने वाला है। ऐसा कैसे हो सकता है?'

मार्च में एक अलग याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा था कि उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के पेंशन लाभ की गणना में इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता कि वे बार या जिला न्यायपालिका से पदोन्नत हुए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा था कि जिला अदालत से पदोन्नत हुए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के पेंशन लाभों की गणना उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उनके अंतिम वेतन के आधार पर की जानी चाहिए।

भाजपा सांसदों से जुड़े देवघर एयरपोर्ट मामले में झारखंड सीआईडी के अधिकार क्षेत्र पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भाजपा सांसदों निशिकांत दुबे और मनोज तिवारी के खिलाफ आरोपों की जांच करने वाली झारखंड सीआईडी की उपयुक्तता पर चिंता जताई, जिन पर देवघर एयरपोर्ट पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल को अनुचित तरीके से प्रभावित करने का आरोप है। यह सवाल इस बात से संबंधित था कि क्या राज्य सीआईडी विमान अधिनियम के तहत आने वाले मामले की वैध रूप से जांच कर सकती है, क्योंकि जस्टिस एएस ओका और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने मामले पर विचार-विमर्श किया।

न्यायालय ने झारखंड हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय के खिलाफ झारखंड सरकार की अपील पर भी अपना फैसला सुरक्षित रखा। 13 मार्च, 2023 को, हाईकोर्ट ने विमान (संशोधन) अधिनियम, 2020 के तहत आवश्यक पूर्व मंजूरी की कमी का हवाला देते हुए सांसदों और अन्य के खिलाफ दर्ज एक प्राथमिकी को रद्द कर दिया था।

राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता जयंत मोहन और भाजपा नेताओं का बचाव करने वाले वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने पीठ के समक्ष अपनी दलीलें पेश कीं। न्यायमूर्ति ओका ने विशेष रूप से सीआईडी की संलिप्तता की प्रक्रियात्मक वैधता पर सवाल उठाया, तथा ऐसे अपराधों से निपटने के लिए विमान अधिनियम के तहत विशेष तंत्र के अस्तित्व पर प्रकाश डाला।

यह मामला अगस्त 2023 में देवघर जिले के कुंडा पुलिस स्टेशन में दर्ज एक एफआईआर से उत्पन्न हुआ। इसमें आरोप लगाया गया कि 31 अगस्त, 2022 को सांसदों ने एटीसी कर्मियों को निर्धारित परिचालन घंटों से परे उड़ान भरने के लिए अपनी चार्टर्ड फ्लाइट को मंजूरी देने के लिए मजबूर किया, जो स्थापित सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन था।

बचाव में, दुबे के वकील ने पहले हाईकोर्ट में तर्क दिया था कि दिल्ली के लिए निर्धारित उड़ान, कानूनी परिचालन सीमा के भीतर थी, जो सूर्यास्त के केवल 14 मिनट बाद उड़ान भरती थी, जो विमानन नियमों के तहत अनुमेय है। उन्होंने दावा किया कि आरोप राजनीति से प्रेरित थे और सांसदों को बदनाम करने के इरादे से लगाए गए थे।

पेड़ों को काटने के लिए नहीं, बचाने के लिए कानून: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि पेड़ों से संबंधित कानून पेड़ों को बचाने के लिए बनाए गए हैं, न कि उन्हें काटने के लिए। कोर्ट ने कहा कि वह दिल्ली में पेड़ों की गिनती और उन्हें बचाने के लिए कदम उठाने के बारे में आदेश देगा।

यह मामला पर्यावरणविद् एम सी मेहता की 1985 में दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि उसने हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए हैं और अब वह एक बाहरी एजेंसी नियुक्त कर इस पर सुझाव लेने की योजना बना रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि सभी वृक्ष कानून पेड़ों को बचाने के लिए हैं, न कि उन्हें काटने के लिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह पेड़ों की गिनती और वृक्ष अधिकारियों तथा प्राधिकरणों के कामकाज की जांच करेगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की अनुमति न दी जाए।



 
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सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना पीड़ित के परिजनों को 50.41 लाख रुपये का मुआवजा बहाल किया

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सड़क दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति के परिवार को 50 लाख रुपये से ज्यादा का मुआवजा देने के खिलाफ मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को रहस्यमय बताया।

सतना जिले में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने मृतक की पत्नी और बेटे के दावे पर 50,41,289 रुपये का मुआवजा तय किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय ने पहली अपील पर मामूली ध्यान दिया और बिना उचित कारण के एमएसीटी द्वारा दिए गए विस्तृत मुआवजे को पलट दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय से यह उम्मीद थी कि वह एमएसीटी में पेश किए गए साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करता। कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 173 के तहत दायर अपील में यह जरूरी था कि उच्च न्यायालय मामले की पूरी जांच करता।


 
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