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Supreme Court Update: जासूसी मामले में यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, जमानत याचिका खारिज

Fri, 05 Jun 2026 11:12 PM IST
अमन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट्स - फोटो : अमर उजाला
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पाकिस्तान को खुफिया जानकारी मुहैया कराने के आरोप में गिरफ्तार ट्रैवल व्लॉगर और यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को ज्योति मल्होत्रा की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है और देश की सुरक्षा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज्योति मल्होत्रा पर पड़ोसी देश को संवेदनशील जानकारी उपलब्ध कराने के गंभीर आरोप हैं। अदालत ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए कहा कि फिलहाल उन्हें जमानत देने का कोई आधार नहीं बनता। 
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शीर्ष अदालत ने कहा, 'हम नहीं मानते कि इस मामले में जमानत दी जानी चाहिए। वे मुकदमे का सामना करें।' ज्योति मल्होत्रा हरियाणा के हिसार की रहने वाली एक ट्रैवल व्लॉगर हैं। वह यूट्यूब पर ट्रैवल विथ जो के नाम से एक लोकप्रिय ट्रैवल चैनल चलाती थीं, जिसके जरिए उन्होंने बड़ी संख्या में दर्शक और फॉलोअर्स बनाए थे। हालांकि बाद में उन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के गंभीर आरोप लगे।

हरियाणा पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने लंबे समय तक निगरानी रखने के बाद 16 मई 2025 को हिसार स्थित उनके आवास से उन्हें गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसियों का दावा है कि ज्योति मल्होत्रा लगातार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े अधिकारियों और हैंडलर्स के संपर्क में थीं। आरोप है कि उन्होंने भारत से जुड़ी कई संवेदनशील और प्रतिबंधित जानकारियां पाकिस्तानी एजेंटों तक पहुंचाईं। इसी आधार पर उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रावधानों के तहत जांच की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के जमानत देने से इनकार करने के बाद अब ज्योति मल्होत्रा को ट्रायल कोर्ट में कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना में एम्स के कार्यकारी निदेशक को तलब किया
एक वैवाहिक मामले में हलफनामा दाखिल न करने पर कड़ा रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के कार्यकारी निदेशक को अवमानना नोटिस जारी किया है। अदालत ने इस मामले में उनसे स्पष्टीकरण मांगते हुए अगली सुनवाई सात जुलाई को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है।

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि एम्स के निदेशक को इस मामले में बीती 16 अप्रैल को पक्षकार बनाया गया था और हलफनामा दाखिल कर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया गया था। लेकिन, उन्होंने खुद हलफनामा दाखिल करने के बजाय एम्स के उप सचिव निशांत कुमार को इसके लिए अधिकृत कर दिया।

पीठ ने बेहद सख्त लहजे में कहा, हम यहां यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमने विशेष रूप से एम्स के निदेशक से स्पष्टीकरण मांगा था। यह किसी भी व्यक्ति के विवेक पर निर्भर नहीं करता कि वह किसी और को अधिकृत करके अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर दे। जब अदालत को यह बताया गया कि वर्तमान में एम्स में कोई स्थायी निदेशक नहीं है, तब न्यायालय ने कहा कि निदेशक का पदभार संभाल रहे व्यक्ति ने स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया। पीठ ने कहा कि हम वर्तमान निदेशक या कार्यकारी निदेशक को अज्ञानता का कोई लाभ नहीं देंगे।

विदेशी घोषित पांच महिलाओं के निर्वासन पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, केंद्र व असम सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने असम में विदेशी न्यायाधिकरण की ओर से विदेशी घोषित की गई पांच महिलाओं के निर्वासन पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि मामले की अगली सुनवाई तक मौजूदा स्थिति बरकरार रखी जाएगी।
अदालत ने केंद्र सरकार, असम सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस वी. मोहन की पीठ पांच अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में गौहाटी हाईकोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी गई है, जिनमें महिलाओं की याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।

विदेशी न्यायाधिकरण ने इन महिलाओं को बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाला विदेशी नागरिक घोषित किया था। इसके खिलाफ महिलाओं ने पहले गौहाटी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिकाएं खारिज कर दी थीं। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान महिलाओं की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं को निर्वासित किए जाने की आशंका है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल जैसी स्थिति है, उसे बनाए रखा जाए। दो याचिकाओं पर पारित आदेश में अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता हिरासत में हैं तो उन्हें अगली सुनवाई तक निर्वासित नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को 16 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। अब इस मामले में संबंधित पक्षों के जवाब और दलीलें सुनने के बाद अदालत आगे का फैसला करेगी।

 

विदेश यात्रा व त्वरित सुनवाई के अधिकार में संतुलन जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है लेकिन यह पूर्ण अधिकार नहीं है। इसे शिकायतकर्ता के त्वरित सुनवाई के अधिकार और आपराधिक न्याय व्यवस्था के प्रभावी संचालन से जुड़े व्यापक सार्वजनिक हित के साथ संतुलित करना आवश्यक है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने तेलंगाना हाईकोर्ट के 28 अक्तूबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें आरोपी गुनिगति रविंदर राव को अमेरिका जाने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को बहाल कर दिया जिसमें पासपोर्ट जारी होने को विदेश यात्रा की स्वत: अनुमति मानने से इन्कार किया गया था। मामला वर्ष 2014 में एक व्यक्ति की संदिग्ध मौत से जुड़ा है। शिकायतकर्ता सीसा संतोष की शिकायत पर रविंदर राव के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। चार्जशीट दायर होने के करीब 10 वर्ष बाद भी सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि आरोपी ने विभिन्न कानूनी कार्यवाहियों के जरिये बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप प्राप्त किया, जिससे मुकदमा प्रभावित हुआ। अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने पहले अंतरिम राहत का लाभ उठाकर विदेश यात्रा की थी और उसके आचरण को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
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अमेरिका में चिकित्सा उपचार की जरूरत वाली दलील खारिज

अमेरिका में चिकित्सा उपचार की जरूरत संबंधी दलील को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत में भी पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं। पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को अलग-थलग नहीं देखा जा सकता। आरोपी की स्वतंत्रता, शिकायतकर्ता के त्वरित सुनवाई के अधिकार और समाज के हितों के बीच संतुलन जरूरी है। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी सत्र अदालत की अनुमति के बगैर देश नहीं छोड़ सकेगा। हालांकि, आवश्यकता पड़ने पर वह विदेश यात्रा की अनुमति के लिए सक्षम अदालत में आवेदन कर सकता है।
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