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SC: औद्योगिक विकास रुकने के लिए ट्रेड यूनियन जिम्मेदार; एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित

Thu, 29 Jan 2026 05:06 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि देश में औद्योगिक विकास थमने के लिए ट्रेड यूनियन बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी के व्यापक कानूनी ढांचे और प्रवर्तन की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। 
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सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई। - फोटो : ANI
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विस्तार
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जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत के दौरान स्वास्थ्य को लेकर उठे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने वांगचुक की शिकायतों को गंभीर मानते हुए विशेषज्ञ डॉक्टर से उनकी मेडिकल जांच कराने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है, जब वांगचुक राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत बंद हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 59 वर्षीय सोनम वांगचुक की जांच किसी विशेषज्ञ डॉक्टर, खासकर गैस्ट्रोएंटरोलॉजिस्ट से कराई जाए। वांगचुक ने दूषित पानी के कारण पेट से जुड़ी गंभीर समस्याओं की शिकायत की थी। अदालत ने जेल प्रशासन को निर्देश दिया है कि जांच के बाद पूरी मेडिकल रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सोमवार तक कोर्ट में पेश की जाए।

सुनवाई के दौरान वांगचुक की पत्नी गितांजलि अंग्मो की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि वांगचुक लंबे समय से पेट की तकलीफ से जूझ रहे हैं। उनका आरोप है कि जेल में इस्तेमाल हो रहा पानी उनकी सेहत बिगाड़ रहा है और बार-बार मांग करने के बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टर की जांच नहीं कराई गई। सिब्बल ने यह भी मांग की कि वांगचुक को नियमित साप्ताहिक जांच और सुरक्षित पानी की सुविधा दी जाए।
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21 बार हो चुकी है जांच- सरकार का दावा
राजस्थान सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि सोनम वांगचुक की बीते चार महीनों में 21 बार जेल डॉक्टर द्वारा जांच की जा चुकी है। सरकार के अनुसार, हालिया रिपोर्ट में उनका ब्लड प्रेशर सामान्य है और छाती व पेट की जांच में कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आई। वांगचुक को विटामिन बी-12 भी दिया गया है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि बार-बार सामान्य जांच होना काफी नहीं है। अदालत ने माना कि वांगचुक को विशेषज्ञ डॉक्टर की जांच की जरूरत है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि किसी सरकारी अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराई जाएगी और रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपी जाएगी।

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई लद्दाख में छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद की गई थी, जिनमें चार लोगों की मौत और करीब 90 लोग घायल हुए थे। सरकार का आरोप है कि वांगचुक ने हिंसा को भड़काया। एनएसए के तहत किसी व्यक्ति को अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है, हालांकि इसे पहले भी रद्द किया जा सकता है।
 

विस्वभारती के पास हाउसिंग प्रोजेक्ट को सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी, हाईकोर्ट का तोड़फोड़ आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन स्थित विस्वभारती विश्वविद्यालय के पास बने एक व्यावसायिक आवासीय प्रोजेक्ट को बड़ी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें इस निर्माण को गिराने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि केवल प्रक्रियागत कमियों के आधार पर किसी पूरी तरह बने भवन को ढहाना “अत्यंत कठोर” कदम होगा।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने जिस जमीन को “खोई” (संरक्षित) श्रेणी की बताया था, वैसी कोई श्रेणी पश्चिम बंगाल के राजस्व कानूनों में मौजूद ही नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि “खोई” शब्द का इस्तेमाल साहित्यिक संदर्भों में मिलता है, जिसे रवींद्रनाथ टैगोर ने बिरभूम क्षेत्र की विशेष भू-आकृति के लिए किया था, लेकिन यह कोई कानूनी भूमि श्रेणी नहीं है।

कोर्ट ने माना कि निजी डेवलपर आर्सुदय प्रोजेक्ट्स ने 0.39 एकड़ भूमि पर निर्माण के लिए ग्राम पंचायत से आवश्यक मंजूरियां ली थीं। जमीन का ‘डांगा’ (बंजर) से ‘बस्तु’ (आवासीय) में रूपांतरण बाद में स्वीकृत हुआ, लेकिन इससे पूरा निर्माण अवैध नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा कि जब भूमि उपयोग योजना के तहत आवासीय इस्तेमाल की अनुमति थी और किसी धोखाधड़ी या दुर्भावना का प्रमाण नहीं है, तो ध्वस्तीकरण उचित नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जनहित याचिका दायर करने वालों ने यह तथ्य छिपाया कि आसपास पहले से कई आवासीय भवन मौजूद थे। अदालत ने ऐसी पीआईएल को तथ्यात्मक विवादों के निपटारे का जरिया बनाने पर आपत्ति जताते हुए याचिकाकर्ताओं पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। कोर्ट के इस फैसले से इलाके में चल रही कानूनी अनिश्चितता समाप्त हो गई है और प्रोजेक्ट को वैधता मिल गई है।


अन्य वीडियो-

औद्योगिक विकास रुकने के लिए ट्रेड यूनियन जिम्मेदार

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में औद्योगिक विकास थमने के लिए ट्रेड यूनियन बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। कई पारंपरिक औद्योगिक इकाइयां ट्रेड यूनियनों के कारण बंद हुई हैं और ऐसे यूनियन नेता औद्योगिक प्रगति में बाधा बने हैं। इस टिप्पणी के साथ अदालत ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी के व्यापक कानूनी ढांचे और प्रवर्तन की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इन्कार कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत व जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, वह केंद्र और राज्यों को मौजूदा कानूनों में संशोधन करने के लिए रिट जारी नहीं कर सकते। सीजेआई ने याचिका पर विचार करने से अनिच्छा जताते हुए कहा, यदि ऐसी मांगें मंजूर की गईं, तो हर घर मुकदमेबाजी में फंस जाएगा। उन्होंने कहा, सुधारों की अत्यधिक चिंता कभी-कभी अनपेक्षित नतीजे पैदा करती है, जिससे और अधिक शोषण हो सकता है। न्यूनतम वेतन तय करने से लोग घरेलू कामगार रखने से इन्कार कर सकते हैं, जिससे रोजगार के मौके और घटेंगे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने कहा, सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों के लिए पंजीकरण, साप्ताहिक छुट्टी और न्यूनतम वेतन जरूरी है। याचिकाकर्ता पंजीकृत ट्रेड यूनियन है, तो सीजेआई ने यूनियनों पर प्रश्न उठा दिए।

पर्याप्त वेतन न देना अनुच्छेद 21 और 23 का उल्लंघन
रामचंद्रन ने तर्क दिया, पर्याप्त वेतन न देना संविधान के अनुच्छेद 21 व 23 का उल्लंघन है। यह बंधुआ मजदूरी की तरह है। हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया, कानून बनाने का निर्देश देना कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। कोर्ट ने राज्यों से याचिकाकर्ताओं की शिकायतों पर विचार करने का अनुरोध किया है। सीजेआई ने कहा, ट्रेड यूनियनों की वजह से कितनी औद्योगिक इकाइयां बंद हो गई हैं? जरा हकीकत बताइए। सभी पारंपरिक उद्योग, इन झंडा यूनियनों की वजह से बंद हो गए। वे काम नहीं करना चाहते।

सेवा प्रदाता एजेंसियां असली शोषक
पीठ ने सेवा प्रदाता एजेंसियों की ओर से कामगारों के शोषण पर दुख जताया। कहा, अब शहरी केंद्रों में ये एजेंसियां ही वास्तविक शोषक बन गई हैं। सीजेआई ने कहा, मैंने व्यक्तिगत और आधिकारिक तौर पर यह देखा है। सुप्रीम कोर्ट ने एक एजेंसी को कुशल कर्मचारियों के विशेष समूह के लिए 40 हजार रुपये का भुगतान किया, जबकि वास्तव में उन गरीब लड़कियों को सिर्फ 19 हजार रुपये ही मिल रहे थे। अब आप सिर्फ इन्हीं संस्थाओं की सेवाएं लेते हैं, इनके लिए एक शब्द है, जिसका इस्तेमाल मैं खुली अदालत में नहीं कर सकता।

सीजेआई बोले-निस्संदेह शोषण होता है, निपटने के उपाय भी हैं
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, निस्संदेह कामगारों का शोषण होता है, पर इससे निपटने के उपाय भी हैं। लोगों को उनके अधिकारों के बारे में अधिक जागरूक किया जाना चाहिए था। लोगों को अधिक कुशल बनाने के साथ और भी कई सुधार किए जाने चाहिए थे। देशभर में लाखों घरेलू कामगारों की दुर्दशा को स्वीकार करते हुए पीठ ने कहा, न्यायपालिका कानूनों को लागू करने के लिए विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। हालांकि, इसने याचिकाकर्ताओं से राज्यों व केंद्र सरकार के समक्ष घरेलू कामगारों की दुर्दशा को उजागर करने को कहा, ताकि उचित निर्णय किया जा सके।

एसआईआर की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने एसआईआर की चयनात्मक प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसकी तात्कालिकता को चुनौती दी।
राजू ने कहा, छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं, फिर वहां अभी एसआईआर कराने की क्या जरूरत है। उन्होंने यह भी पूछा कि जब 2028 में चुनाव वाले अन्य राज्यों को इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया है, तो छत्तीसगढ़ को शामिल करने का औचित्य क्या है। रामचंद्रन ने दलील दी कि भले ही संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियां व्यापक हों, लेकिन वे न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं और मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं की जा सकतीं। रामचंद्रन ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग का दायित्व केवल यह सुनिश्चित करना नहीं है कि सिर्फ नागरिक ही मतदान करें बल्कि यह भी उसकी जिम्मेदारी है कि हर पात्र नागरिक को मतदाता सूची में शामिल किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान एसआईआर की कार्यप्रणाली सहयोगी होने की बजाय बाधाएं खड़ी करती है क्योंकि इसमें कई मान्य पहचान दस्तावेजों को हटाकर पूरा बोझ मतदाताओं पर डाल दिया गया है। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायण समेत कई वकीलों की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पूरी की।
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एनएचएआई राजमार्गों पर गोशाला बनाने के लिए ठेकेदारों को दे निर्देश: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से कहा कि कहा कि वह राजमार्गों पर लावारिस पशुओं के लिए गोशालाएं स्थापित करने के लिए सड़क ठेकेदारों से कहने पर विचार करे। ठेकेदार सीएसआर (कर्मचारी सेवा संबंध) जिम्मेदारी के तहत गोशालाएं बना सकते हैं। शीर्ष अदालत ने लावारिस कुत्तों से संबंधित अपने पूर्व आदेशों में संशोधन की मांग करने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला बृहस्पतिवार को सुरक्षित रख लिया।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की विशेष पीठ ने एनएचएआई के वकील से एक एप विकसित करने को कहा, जिसके माध्यम से लोग राष्ट्रीय राजमार्गों पर लावारिस पशुओं के दिखने की सूचना दे सकें। पीठ ने वकील से कहा, आप ठेकेदारों से यह भी कह सकते हैं कि वे लगभग 50 किलोमीटर के अंतराल पर गोशाला स्थापित करें, जहां इन लावारिस पशुओं की देखभाल कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत की जा सके। वकील ने एप विकसित करने और ठेकेदारों से गोशाला स्थापित करने के लिए कहने की संभावना पर विचार करने पर सहमति जताई।  

एनएचएआई के वकील ने बताया कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर 1,300 से अधिक संवेदनशील स्थान हैं और प्राधिकरण सड़क दुर्घटनाओं से बचने के लिए इस समस्या से निपट रहा है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया।
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