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Supreme Court: राहुल गांधी को समन पर रोक का अंतरिम आदेश बरकरार; उदयपुर फाइल्स फिल्म पर हाई कोर्ट करेगा सुनवाई

Fri, 25 Jul 2025 02:02 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ उत्तर प्रदेश में दर्ज आपराधिक मामले में सुनवाई पर लगी रोक को शुक्रवार को आगे बढ़ा दिया। यह मामला 2022 में विनायक दामोदर सावरकर पर की गई टिप्पणी से जुड़ा है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मामले में स्थगन की मांग को स्वीकार करते हुए सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने अदालत को बताया कि राज्य ने राहुल गांधी की याचिका का जवाब दाखिल कर दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कांग्रेस नेता की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अधिवक्ता नृपेन्द्र पांडे द्वारा दर्ज की गई शिकायत उचित है और राहुल गांधी के बयान समाज में घृणा फैलाने के उद्देश्य से दिए गए थे। 25 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी की टिप्पणी को 'गैर-जिम्मेदाराना' बताया था और कहा था कि आजादी के सेनानियों का उपहास नहीं किया जाना चाहिए।
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उदयपुर फाइल्स फिल्म को रिलीज की मंजूरी पर सुनवाई 28 जुलाई को करेगा दिल्ली हाईकोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि दिल्ली हाईकोर्ट 28 जुलाई को उस याचिका पर सुनवाई करे, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ को रिलीज की मंजूरी दिए जाने को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह फिल्म समाज में नफरत और सांप्रदायिक तनाव फैला सकती है। केंद्र ने इस फिल्म को प्रदर्शन के लिए हरी झंडी दी थी, जिसके खिलाफ कुछ संगठनों ने कोर्ट में याचिका दाखिल की है। उनका कहना है कि फिल्म का कंटेंट एकतरफा है और यह विशेष समुदाय को निशाना बना सकता है। अब हाईकोर्ट तय करेगा कि फिल्म की रिलीज पर रोक लगाई जाए या नहीं। यह मामला अभिव्यक्ति की आजादी बनाम सामाजिक जिम्मेदारी के सवाल को एक बार फिर चर्चा में ला रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से यौन उत्पीड़न  में दोषी की सजा को उम्रकैद में बदला
 सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न मामले में दोषसिद्धी बरकरार रखते हुए एक दोषी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। दोषी को पहले शेष जीवन तक कैद की सजा सुनाई गयी थी। शीर्ष अदालत ने यह फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के सितंबर 2023 के आदेश के खिलाफ अपीलकर्ता की अर्जी पर सुनाया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस दलील को उचित पाया कि अपराध मई 2019 में हुआ था, इसलिए यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) की धारा 6 का संशोधित प्रावधान इस मामले में लागू नहीं हो सकता।

कोर्ट ने पाया, अपराध के समय कानून के तहत तय से अधिक सजा मिली
 धारा 6 गंभीर यौन हमले के लिए दंड से संबंधित है। पीठ ने कहा कि अधिनियम की धारा 6 का संशोधित प्रावधान 16 अगस्त, 2019 को लागू हुआ था। 2019 के संशोधन से पहले धारा 6 में न्यूनतम 10 वर्ष और अधिकतम उम्रकैद की सजा के साथ-साथ जुर्माने का प्रावधान था। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए कहा, अनुच्छेद 20(1) के तहत कठोर दंड को पिछली तारीख से लागू करने पर सांविधानिक रोक स्पष्ट और पूर्ण है। संविधान का अनुच्छेद 20(1) अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण से संबंधित है। पीठ ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 6 में 2019 के संशोधन में लागू की गई बढ़ी हुई सजा को प्रभावी रूप से लागू किया, जिससे दोषी को अपराध के समय कानून के तहत अनुमेय सजा से अधिक सजा मिली।

 असंशोधित धारा 6 के तहत, अधिकतम अनुमेय सजा आजीवन कारावास थी, न कि शेष जीवन तक कैद। पीठ ने कहा, इसलिए हम पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी सजा को असंशोधित कानून के तहत कठोर आजीवन कारावास में संशोधित करते हैं और शेष जीवन तक कैद की सजा को रद्द करते हैं। अदालत ने हालांकि दोषी पर लगाया गया 10,000 रुपये का जुर्माना बरकरार रखा।
 

मनो-सामाजिक दिव्यांगता वालों का पुनर्वास संवेदनशील मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनो-सामाजिक दिव्यांगता से पीड़ित बेघर लोगों का पुनर्वास एक संवेदनशील मुद्दा है। शीर्ष अदालत ने केंद्र से इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से लेने का निर्देश दिया। मनो-सामाजिक दिव्यांगता का अर्थ उन चुनौतियों से है जिनका सामना मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं वाले लोग सामाजिक भेदभाव, सहायता की कमी आदि के कारण करते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने केंद्र की ओर से पेश वकील से कहा, आपको इसे बेहद गंभीरता से लेना चाहिए और वह भी कम से कम समय में। केंद्र ने मामले में अब तक हुई प्रगति से अवगत कराने के लिए कोर्ट से आठ सप्ताह का समय मांगा। शीर्ष अदालत वकील गौरव कुमार बंसल की मनो-सामाजिक विकलांगता से पीड़ित लोगों के लिए नीति बनाने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई कर रहा था।  

बेघर लोग सचमुच फुटबॉल बनते जा रहे
बंसल ने पीठ से कहा, केंद्र ने इस मामले में एक जवाबी हलफनामा दायर किया है। पीठ ने कहा, हां, एक संक्षिप्त जवाब रिकॉर्ड में है। इसपर केंद्र के वकील ने कहा, हम पहले से ही विचार-विमर्श कर रहे हैं। मैं अब तक की प्रगति को रिकॉर्ड में दर्ज करने के लिए आठ सप्ताह का समय मांग रहा हूं। बंसल ने कहा कि बेघर लोग सचमुच फुटबॉल बनते जा रहे हैं।
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दृष्टिबाधित अभ्यर्थी की याचिका पर उत्तराखंड सरकार को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने दृष्टिबाधित और चलने-फिरने में अक्षम व्यक्तियों को न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल न करने के फैसले को चुनौती वाली याचिका पर उत्तराखंड सरकार और उसके लोक सेवा आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

जस्टिस जेबी पारदीवाला व जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने श्रव्या सिंधुरी की याचिका पर उत्तराखंड सरकार, लोक सेवा आयोग और हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को नए नोटिस जारी किए। पीठ को बताया गया कि पूरी तरह से दृष्टिबाधित याचिकाकर्ता ने न्यायिक परीक्षाओं के लिए दृष्टिहीनों और चलने-फिरने में अक्षम लोगों को पात्रता से बाहर रखने के फैसले को चुनौती दी है। पीठ ने राज्य को यह देखते हुए नोटिस जारी किया कि परीक्षा 31 अगस्त से शुरू होनी थी और पूर्व नोटिस के बावजूद कोई भी उपस्थित नहीं हुआ।
 शीर्ष अदालत ने 3 मार्च को इसी तरह के एक मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि दृष्टिबाधित व्यक्तियों को न्यायिक सेवाओं में रोजगार के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
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