करूर भगदड़ हादसे पर सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई
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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि यह कुप्रथा आज भी समाज में व्यापक रूप से मौजूद है और इसका उन्मूलन एक जरूरी संवैधानिक व सामाजिक दायित्व है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि दहेज विरोधी मौजूदा कानून प्रभावी नहीं रह गए हैं और कई मामलों में इनका दुरुपयोग भी हो रहा है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि केवल कानून के भरोसे इस सामाजिक बुराई से नहीं निपटा जा सकता, बल्कि इसके लिए समाज, सरकार और संस्थानों को मिलकर सामूहिक प्रयास करने होंगे। पीठ ने कहा कि विवाह के दोनों पक्ष बराबर हैं और कोई भी किसी के अधीन नहीं है। यह संवैधानिक भावना समाज के हर स्तर पर पहुंचनी चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दहेज प्रथा किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग आस्थाओं और समाजों में फैली हुई है।
अदालत ने कहा कि एक ओर जहां दहेज निषेध कानून प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए और 304-बी के प्रावधानों का कई मामलों में गलत उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल भी किया गया है। इससे न्यायिक प्रणाली पर दबाव बढ़ता है और वास्तविक पीड़ितों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि वे दहेज हत्या और क्रूरता से जुड़े लंबित मामलों की संख्या, सबसे पुराने से लेकर नए मामलों तक, का आकलन करें और उनके शीघ्र निपटान के लिए कदम उठाएं। यह टिप्पणी 24 साल पुराने एक दहेज हत्या मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर फैसला सुनाते हुए की गई। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलटते हुए दोषसिद्धि बहाल कर दी। हालांकि, 94 वर्षीय महिला दोषी को उम्र को देखते हुए जेल नहीं भेजा गया, लेकिन अन्य दोषी को चार सप्ताह में आत्मसमर्पण कर आजीवन कारावास की सजा काटने का निर्देश दिया गया। अदालत ने केंद्र और राज्यों से शिक्षा पाठ्यक्रम में बदलाव कर सामाजिक चेतना मजबूत करने को भी कहा।
मणिपुर हिंसा : लीक हुई सभी ऑडियो क्लिप को जांच के लिए नहीं भेजने पर सुप्रीम सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि याचिका में मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की 2023 की जातीय हिंसा में भूमिका की ओर इशारा करने वाले सभी उपलब्ध लीक ऑडियो क्लिप को फोरेंसिक जांच के लिए क्यों नहीं भेजा गया।शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की ओर से 20 नवंबर को दायर हलफनामे से वह थोड़ा विचलित है, जिसमें यह कहा गया है कि सिर्फ चुनिंदा कतरनें ही भेजी गई थीं। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सरकारी अधिकारियों से पूछा कि लगभग 48 मिनट की लीक हुई ऑडियो क्लिप को गुजरात के राष्ट्रीय फोरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (एनएफएसयू) में जांच के लिए क्यों नहीं भेजा गया। एनएफएसयू ने लगभग क्लीन चिट देते हुए कहा कि लीक हुई ऑडियो क्लिप के साथ छेड़छाड़ की गई थी। मणिपुर में भाजपा के भीतर असंतोष और नेतृत्व परिवर्तन की बढ़ती मांगों के बीच सिंह ने 9 फरवरी को मणिपुर के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
प्रतिवादियों की ओर से पेश हुए वकील ने कहा कि हलफनामा उन्हें नहीं दिया गया था। इस पर पीठ ने कहा, अब इस हलफनामे, जो आपके अनुसार आपको नहीं दिया गया है, में कहा गया है कि सिर्फ चुनिंदा कतरनें ही भेजी गई थीं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि संभवतः उनकी ओर से दिए गए सभी ऑडियो क्लिप एनएफएसयू को नहीं भेजे गए थे। पीठ ने पूछा, वास्तव में कितनी सामग्री उपलब्ध है? भूषण ने बताया कि कुल ऑडियो टेप लगभग 56 मिनट के हैं और याचिकाकर्ताओं ने अदालत में 48 मिनट का हिस्सा पेश किया है। उन्होंने कहा कि ऑडियो क्लिप के शेष हिस्से से उस व्यक्ति की पहचान होती है जिसने यह रिकॉर्डिंग की है, और यदि उसकी पहचान उजागर हो जाती है, तो उसकी जान को खतरा हो सकता है। पीठ ने पूछा, जब पूरा टेप आपके पास उपलब्ध था, तो पूरा टेप एनएफएसयू को भेजा जाना चाहिए था। उन्होंने केवल यह सीमित हिस्सा ही क्यों भेजा? मामले में पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने हलफनामे पर जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा। पीठ ने हलफनामे को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी को तय कर दी।
CAT जम्मू को जल्द उपलब्ध कराए परिसर: सुप्रीम कोर्ट
केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की जम्मू पीठ के लिए उपयुक्त परिसर उपलब्ध न कराए जाने से नाराज सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व जम्मू-कश्मीर प्रशासन को निर्देश दिया कि एक महीने के भीतर उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया जाए। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ 2020 में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता अचल शर्मा ने आरोप लगाया था कि कैट जम्मू को न तो पर्याप्त जगह उपलब्ध है और न ही पर्याप्त सहायक स्टाफ। इससे न्यायाधिकरण का दैनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है।