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SC Updates: निचली अदालतों में न्यायाधीशों की धीमी पदोन्नति पर कोर्ट सख्त, कहा- पूरे देश में समान मानदंड जरूरी

Wed, 29 Oct 2025 04:42 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पूर्व मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन ने कहा कि न्याय केवल अदालतों और कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समानता, निष्पक्षता और मानव गरिमा की रक्षा का जीवित सिद्धांत है। उन्होंने नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में ये बाते कही।  
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि देशभर में निचली अदालतों के न्यायिक अधिकारियों की असमान और धीमी पदोन्नति को सुधारने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समान नीति बनाना जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की जगह अब मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालयों की स्वायत्तता से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी, लेकिन वरिष्ठता तय करने के लिए कुछ एकरूपता जरूरी है। अदालत ने चिंता जताई कि ज्यादातर राज्यों में सिविल जज स्तर पर भर्ती होने वाले अधिकारी प्रधान जिला न्यायाधीश तक नहीं पहुंच पाते, जिससे प्रतिभाशाली वकील इस सेवा में शामिल होने से कतराते हैं।
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अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि वरिष्ठता का मसला हर राज्य की स्थिति पर निर्भर करता है, इसलिए इसे उच्च न्यायालयों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक समान नीति लागू करने से प्रमोशन को लेकर असंतुलन पैदा होगा। वहीं, न्यायमित्र सिद्धार्थ भटनागर ने बताया कि वर्तमान में पदोन्नति सीनियरिटी आधारित है, जिससे प्रमोटेड जज रिटायर हो जाते हैं और ऊपरी पदों पर सीधे भर्ती हुए अधिकारी अधिक समय तक बने रहते हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि यह पहल ट्रायल एंड एरर के आधार पर की जा रही है ताकि न्यायिक सेवा में निष्पक्षता और समानता सुनिश्चित की जा सके। सुनवाई फिलहाल अधूरी रही और आगे जारी रहेगी।

'न्याय केवल कानूनों तक सीमित नहीं', पूर्व CJI बालाकृष्णन बोले- मानवता और करुणा ही सच्ची अभिव्यक्ति
पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन ने कहा है कि न्याय कोई अमूर्त अवधारणा नहीं, जो केवल कानूनों या अदालतों तक सीमित हो, बल्कि यह एक जीवित सिद्धांत है, जो समानता, निष्पक्षता और प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान में झलकता है। उन्होंने कहा कि न्याय की सच्ची भावना समाज में समान व्यवहार और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देने से प्रकट होती है।
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बालाकृष्णन बुधवार को इंटरनेशनल ज्यूरिस्ट्स पीस प्राइज 2025 प्रदान किए जाने के अवसर पर बोल रहे थे। यह पुरस्कार कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप लियो XIV को शांति, अंतरधार्मिक सद्भाव और मानव गरिमा को बढ़ावा देने में उनके योगदान के लिए दिया गया। यह सम्मान नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में प्रदान किया गया, जिसमें न्याय, मानवाधिकार और धर्म के क्षेत्र से जुड़ी कई हस्तियां मौजूद थीं।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय केवल अदालतों या विधानों में नहीं रहता, बल्कि यह हर उस कार्य में प्रकट होता है जहां इंसानियत, करुणा और समानता की भावना होती है। उन्होंने कहा कि न्याय एक जीवित सिद्धांत है जो समानता, निष्पक्षता और हर व्यक्ति के प्रति सम्मान के रूप में व्यक्त होता है। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल विवाद सुलझाना नहीं बल्कि समाज में संतुलन, शांति और गरिमा की रक्षा करना है। उन्होंने आगे कहा कि पोप लियो XIV ने अपने जीवन में इस सिद्धांत को कर्म के रूप में जिया है। उनकी अपीलें हिंसा और भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में रही हैं। उन्होंने दया, क्षमा और उपेक्षित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए जो कार्य किए हैं, उनसे दुनियाभर के लोग प्रेरित हुए हैं।

डॉक्टर के सामने दिया बयान भरोसेमंद, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद की सजा बरकरार रखी
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात की एक महिला की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि पीड़िता का डॉक्टर के सामने दिया गया बयान सबसे भरोसेमंद है। यह मामला 2004 का है, जब महिला ने अपनी रिश्तेदार को जिंदा जलाकर मार दिया था। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि पीड़िता का बयान स्वतंत्र और अन्य सबूतों से मेल खाता है। अदालत ने आरोपी के इस दावे को खारिज किया कि आग दुर्घटनावश लगी थी। पहले ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बरी किया था, लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील पर उसे दोषी ठहराया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए सजा बरकरार रखी है।

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार पर जताई नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि वह खनन कंपनियों से बकाया वसूली में सुस्ती दिखा रही है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार को राजस्व हानि रोकनी चाहिए। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि बकाया वसूली करोड़ों रुपये की है, लेकिन सरकार टालमटोल कर रही है। अदालत ने राज्य को एक दिसंबर तक नई स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा कि 2017 के आदेश के बावजूद बकाया वसूली में ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
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