फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक और कदम, सुप्रीम कोर्ट बार में एक तिहाई महिला आरक्षण देने का आदेश

Fri, 03 May 2024 05:57 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

Supreme Court: शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि एससीबीए के पदाधिकारियों का एक पद विशेष रूप से महिलाओं के लिए बारी-बारी से और रोटेशन के आधार पर आरक्षित किया जाएगा। पीठ ने कहा कि यह विशेष महिला आरक्षण 2024-25 के चुनावों के लिए कोषाध्यक्ष पद से शुरू होगा।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट ने महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक और कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) चुनाव में एक तिहाई महिला आरक्षण लागू करने का आदेश दिया है। यह व्यवस्था वर्ष 2024 के चुनावों से ही प्रभावी होगी।

विज्ञापन


जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि 2024-25 के आगामी चुनावों में एससीबीए के कोषाध्यक्ष का पद एक महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित किया जाएगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि यह आरक्षण पात्र महिला सदस्यों को अन्य पदों के लिए चुनाव लड़ने से नहीं रोकेगा। 

शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि एससीबीए के पदाधिकारियों का एक पद विशेष रूप से महिलाओं के लिए बारी-बारी से और रोटेशन के आधार पर आरक्षित किया जाएगा। पीठ ने कहा कि यह विशेष महिला आरक्षण 2024-25 के चुनावों के लिए कोषाध्यक्ष पद से शुरू होगा।
विज्ञापन


अदालत ने निर्देश दिया कि एससीबीए की कनिष्ठ कार्यकारी समिति (9 में से 3) और वरिष्ठ कार्यकारी समिति (6 में से 2) में महिलाओं के लिए न्यूनतम 1/3 आरक्षण होगा। 16 मई को चुनाव होने हैं। वोटों की गिनती 18 मई को शुरू होगी। परिणाम 19 मई को घोषित किए जाएंगे।

क्या यूपी में है इकबालिया बयान को चार्जशीट में शामिल करने की प्रथा
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस से यह जानना चाहा है कि क्या उसके राज्य में पुलिस के सम्मक्ष दिए गए इकबालिया बयान को चार्जशीट में शामिल करने की प्रथा है? दरअसल, जांच के दौरान दर्ज आरोपियों के बयानों को चार्जशीट में शामिल करने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने असहमति जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उनमें से कुछ बयान कथित इकबालिया बयान की प्रकृति के हैं।

जस्टिस अभय एस ओका व जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा, हमने पाया है कि आरोपियों के तथाकथित बयान जो कथित तौर पर पूछताछ के दौरान दर्ज किए गए हैं, आरोपपत्र का हिस्सा हैं। उनमें से कुछ इकबालिया बयान की प्रकृति के हैं। प्रथम दृष्टया, यह अवैध है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 (धारा 24 से 26) के अनुसार, पुलिस हिरासत में अभियुक्त की ओर से की गई स्वीकारोक्ति साक्ष्य में स्वीकार्य नहीं है। शीर्ष अदालत ने उप्र के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि आरोपियों के पुलिस के सामने दिए इकबालिया बयान समेत अन्य बयानों को आरोपपत्र में शामिल करने की प्रथा के संबंध में जांच करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें