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SC Updates: 'सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में रिक्त पद चार महीने में भरें', सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश

Thu, 15 Jan 2026 10:43 PM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा, कई सरकारी और निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की कमी की खबरों को ध्यान में रखते हुए, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि सभी रिक्त संकाय पदों (शिक्षण और गैर-शिक्षण दोनों) को चार महीने के भीतर भरा जाए। शीर्ष अदालत ने छात्र हित में देश भर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए बृहस्पतिवार को व्यापक दिशा निर्देश जारी किए। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्देश यह दिया कि देश भर के उच्च शिक्षण संस्थान किसी भी छात्र की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु की सूचना तत्काल पुलिस को देंगे।

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बृहस्पतिवार को उच्च शिक्षण संस्थानों के बारे में व्यापक निर्देश जारी करते हुए जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा, सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में समग्र रूप से सुरक्षित, समान, समावेशी और शिक्षा के अनुकूल वातावरण होना चाहिए। यह इन संस्थानों का मूलभूत कर्तव्य है और वे इससे पीछे नहीं हट सकते।

छात्रों की आत्महत्या को छात्रों की पीड़ा और कल्याण से जुड़ी एक विशाल समस्या का मात्र एक छोटा सा हिस्सा मानते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि कुलपति, रजिस्ट्रार और अन्य महत्वपूर्ण संस्थागत एवं प्रशासनिक पदों पर रिक्तियों की नियुक्ति और उन्हें भरना चार महीने के भीतर किया जाना चाहिए। इसके अलावा, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उच्च शिक्षा संस्थानों के सुचारू संचालन के लिए इन पदों को रिक्ति उत्पन्न होने की तिथि से एक महीने के भीतर भरा जाए। सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को वार्षिक आधार पर यह रिपोर्ट देनी होगी कि कितने आरक्षित पद रिक्त हैं, कितने भरे गए हैं, रिक्तियों के कारण, इसमें लगा समय आदि, ताकि आवधिक जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
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पीठ ने कहा, चार महीने में भरे जाने वाले पदों में हाशिए पर पड़े और अल्पप्रतिनिधित्व वाले समुदायों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित पदों को प्राथमिकता दी जाए, जिनमें दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित पद भी शामिल हैं। अदालत ने आगे कहा कि केंद्र और राज्य सरकार के नियमों के अनुसार विभिन्न प्रकार के आरक्षण के अंतर्गत आने वाले संकाय भर्ती के लिए विशेष भर्ती अभियान चलाए जा सकते हैं।

छात्र की मौत कहीं भी हुई हो, संस्थान को सूचना देनी ही होगी
पीठ ने कहा, सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को किसी भी छात्र की आत्महत्या या अप्राकृतिक मृत्यु की सूचना, फिर चाहे वह परिसर के अंदर, छात्रावासों में, स्नातकोत्तर आवासों में या संस्थान के बाहर हुई हो, जानकारी मिलते ही संस्थान को तुरंत पुलिस को देनी होगी। यह निर्देश सभी छात्रों के लिए लागू होगा, फिर चाहे वे नियमित हों, दूरस्थ शिक्षा वाले हों या ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त कर रहे हों। पीठ ने यह भी कहा कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों या किसी भी ऐसे उच्च शिक्षण संस्थान के मामले में जो उपरोक्त उच्च शिक्षण संस्थान के ढांचे में नहीं आते, उन्हें इसकी सूचना भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग को देनी होगी।

आत्महत्याओं का डाटा केंद्रीकृत रूप से संरक्षित किया जाए
शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि आत्महत्याओं, विशेष रूप से 15-29 वर्ष आयु वर्ग के लोगों की आत्महत्याओं से संबंधित नमूना पंजीकरण प्रणाली के आंकड़ों को केंद्रीय रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए, ताकि उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों की आत्महत्या से होने वाली मौतों का बेहतर और अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सके।

परिसर में या एक किलोमीटर के दायरे में चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो
शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि प्रत्येक आवासीय उच्च शिक्षण संस्थान में चौबीसों घंटे योग्य चिकित्सा सहायता उपलब्ध होनी चाहिए। यदि परिसर में उपलब्ध न हो तो इसे एक किलोमीटर के दायरे में निश्चित रूप से होना चाहिए ताकि छात्रों को आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्रदान की जा सके।

चार महीने में सभी लंबित छात्रवृत्ति का भुगतान करें
एक अन्य निर्देश में पीठ ने कहा, केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों द्वारा सभी लंबित छात्रवृत्ति वितरणों का निपटारा चार महीने के भीतर किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में सभी छात्रवृत्तियों का वितरण स्पष्ट समय-सीमा के भीतर और केंद्र और राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों द्वारा बिना किसी देरी के किया जाए। छात्रों को वितरण की तिथियों और समय-सारणी की जानकारी दी जानी चाहिए। अपरिहार्य प्रशासनिक देरी के मामलों में भी, उच्च शिक्षण संस्थानों को नीति के रूप में छात्रों को शुल्क भुगतान या निपटान के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराना चाहिए।

किसी छात्र को परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाएगा
पीठ ने कहा, किसी भी छात्र को परीक्षा में बैठने से नहीं रोका जाना चाहिए, छात्रावास से नहीं निकाला जाना चाहिए, कक्षाओं में भाग लेने से प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए, या छात्रवृत्ति वितरण में देरी के कारण उनकी मार्कशीट और डिग्री को रोककर नहीं रखा जाना चाहिए। ऐसी किसी भी संस्थागत नीति को सख्ती से देखा जाना चाहिए। पीठ ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया कि वे उन सभी नियमों का पूर्णतः पालन करें जो उन पर बाध्यकारी प्रभाव डालते हैं, जिनमें यूजीसी का उच्च शिक्षा संस्थानों में रैगिंग की समस्या पर अंकुश लगाने संबंधी विनियमन, 2009 और अन्य संबंधित प्रावधान शामिल हैं।

आरडब्ल्यूए को डेवलपर कंपनी की दिवालिया कार्यवाही में दखल का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि हाउसिंग प्रोजेक्ट में रखरखाव और प्रबंधन के लिए बनी होमबायर्स सोसायटी या रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) को आमतौर पर डेवलपर कंपनी की दिवालिया कार्यवाही में दखल देने का अधिकार नहीं है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने तक्षशिला हाइट्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े दिवालियापन मामले में कार्यवाही को सही ठहराते हुए यह टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर कोई लेनदार दिवाला और ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), 2016 के तहत कार्यवाही शुरू करता है, तो उसका उद्देश्य कंपनी का पुनरुद्धार होना चाहिए, न कि केवल पैसा वसूलना। पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर पुनरुद्धार उद्देश्य नहीं है, तो आईबीसी को जल्दबाजी में वसूली का साधन नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए एसएआरएफएईएसई अधिनियम या अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।

अदालत ने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के उस फैसले को भी सही ठहराया, जिसमें एलिग्ना को-ऑपरेटिव हाउसिंग एंड कमर्शियल सोसायटी लिमिटेड की हस्तक्षेप याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई थी कि उसे इस मामले में दखल देने का अधिकार (लोकस स्टैंडी) नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईबीसी एक संपूर्ण कानून है और इसमें केवल उन्हीं लोगों को भागीदारी का अधिकार है, जिन्हें कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

मृत्यु से ठीक पहले दिया गया बयान भरोसेमंद : कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मकसद का पुख्ता सबूत न होने पर भी मृत्यु से ठीक पहले दिया गया बयान भरोसेमंद और विश्वसनीय होता है और अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता है। पीठ ने कहा,  मकसद महत्वपूर्ण होता है, खासकर उन मामलों में जो पारिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित होते हैं। पीठ ने पत्नी सरोज देवी पर केरोसिन डालकर आग लगाकर हत्या करने के आरोपी चमन लाल के बरी होने के फैसले को पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसने उसे हत्या के आरोपों में दोषी ठहराया था। 
 
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12 साल से अचेत बेटे को इच्छामृत्यु देने की पिता की याचिका पर फैसला सुरक्षित
सुप्रीम कोर्ट ने एक पिता की उस याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया जिसमें 12 साल से अधिक समय से कोमा में गए उनके 31 वर्षीय बेटे के कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों को हटाकर परोक्ष इच्छामृत्यु देने का अनुरोध किया गया है। याचिका के मुताबिक, हरीश राणा 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे और उनके सिर में गंभीर चोट आईं थी। वह पिछले 12 वर्षों से अधिक समय से कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली के सहारे हैं।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी और याचिकाकर्ता (पिता) अशोक राणा का प्रतिनिधित्व कर रहीं अधिवक्ता रश्मी नंदकुमार की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। पीठ ने सुनवाई के दौरान परिवार की तरफ से सुसंगत और सुविचारित निर्णय लेने के महत्व को नोट किया। याचिकाकर्ता की अधिवक्ता ने दलील दी कि जिन मामलों में परिजन जीवन रक्षक उपचार हटाने की इच्छा प्रकट करते हैं, उनमें चिकित्सकीय जांच के लिए गठित मेडिकल बोर्ड में शामिल होने के लिए अस्पतालों को उपयुक्त चिकित्सकों को नामित करना चाहिए।  

नंदकुमार ने अदालत से अनुरोध किया कि वह अपने फैसले में परोक्ष इच्छामृत्यु शब्द का प्रयोग न करे बल्कि जीवन रक्षक उपचार को वापस लेना या रोकना शब्द का प्रयोग करे।
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