सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के एक दहेज हत्या मामले में आरोपी पति को इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से दी गई जमानत रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों में जमानत देते समय अदालतों को अत्यंत संवेदनशील और सतर्क रहने की आवश्यकता है।
एक सप्ताह में आत्मसमर्पण का आदेश
शीर्ष अदालत ने मृतक महिला के पिता की अपील को स्वीकार करते हुए आरोपी पति को आदेश दिया है कि वह एक सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करे। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि वह निर्धारित समय में सरेंडर नहीं करता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला गाजियाबाद का है, जहां फरवरी 2019 में मृतका की शादी हुई थी। शादी के सात साल पूरे होने से पहले ही, 11 जुलाई 2024 को महिला अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई। मृतका के पिता ने एफआईआर में आरोप लगाया कि शादी में 30 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी पति और उसके ससुराल वाले संतुष्ट नहीं थे। वे लगातार एक एसयूवी गाड़ी और 10 लाख रुपये नकद की मांग कर रहे थे।
आरोप है कि मांग पूरी न होने पर महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। मौत से कुछ समय पहले महिला ने फोन पर अपने पिता को बताया था कि उसके साथ मारपीट की जा रही है और उसे जान से मारने की धमकी दी गई है।
हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अगस्त 2025 में आरोपी को इस आधार पर जमानत दी थी कि मौत का कारण फांसी के कारण दम घुटना था और एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इतने गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में विवेक का प्रयोग करते हुए घोर त्रुटि की है। जमानत अर्जी पर विचार करते समय अपराध की प्रकृति और प्रथम दृष्टया साक्ष्यों को देखना अनिवार्य है, जिन्हें यहां नजरअंदाज किया गया।' सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में अदालतों को आगाह किया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और दहेज हत्या जैसे मामलों को बहुत हल्के में लेना कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने मैसूरु के सौ साल से भी अधिक पुराने देवराजा मार्केट और लैंसडाउन बिल्डिंग को संरक्षित करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन धरोहरों को गिराने के बजाय आवश्यक मरम्मत और जीर्णोद्धार के जरिए सुरक्षित रखा जाए।
IIT रुड़की की रिपोर्ट बनी आधार
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने चार मई को यह आदेश IIT रुड़की की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट देखने के बाद दिया। पिछले साल सितंबर में कोर्ट ने इस समिति को दोनों इमारतों की स्थिति और उनके संरक्षण की संभावनाओं के मूल्यांकन की जिम्मेदारी सौंपी थी।
- समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दोनों इमारतें मैसूरु की नागरिक वास्तुकला का अभिन्न हिस्सा हैं।
- इनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है, इसलिए इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।
- वैज्ञानिक मूल्यांकन के आधार पर एक विस्तृत कंजर्वेशन प्लान बनाकर काम शुरू करने की जरूरत है।
हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती
यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट के अगस्त 2023 के उस फैसले के खिलाफ दायर किया गया था, जिसमें इन इमारतों को गिराने या दोबारा बनाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन संरचनाओं के संरक्षण की बात कहकर हाईकोर्ट के रुख को बदल दिया है।