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Supreme Court Updates: सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- खनिज टैक्स पर राज्यों का अधिकार, 20 मई को सुनवाई

Wed, 06 May 2026 05:17 PM IST
राकेश कुमार पीटीआई, नई दिल्ली

सार

राज्यों के आर्थिक अधिकारों से लेकर केंद्र की कानूनी चुनौतियों तक...सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है? जजों ने क्या कहा? शीर्ष अदालत की कार्यवाही से जुड़ी हर बड़ी हलचल और कानूनी अपडेट जानिए...
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सुप्रीम कोर्ट अपडेट - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बड़ा फैसला लिया। अदालत अब 20 मई को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में उसकी क्यूरेटिव याचिका अभी लंबित है। यह पूरा मामला राज्यों की विधायी शक्ति और टैक्स वसूलने के अधिकार से जुड़ा है।
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नौ जजों की पीठ का ऐतिहासिक फैसला
सितंबर 2024 में शीर्ष अदालत ने समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इससे पहले 25 जुलाई 2024 को नौ जजों की बेंच ने बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने 8:1 के बहुमत से कहा था कि खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की शक्ति राज्यों के पास है। शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्र के पास संविधान की सूची-1 की प्रविष्टि 54 के तहत यह अधिकार नहीं है।

केंद्र की दलील और राज्यों का विरोध
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच से सुनवाई टालने का अनुरोध किया। उन्होंने लंबित क्यूरेटिव याचिका का हवाला दिया। कुछ वकीलों ने इसे जुलाई तक टालने की मांग की। हालांकि, राज्यों के वकीलों ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि समीक्षा याचिकाएं पहले ही खारिज हो चुकी हैं। कुछ अपीलें तो 1999 और 2011 से लंबित हैं। बेंच ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अगली तारीख 20 मई तय की।
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14 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को बड़ी राहत दी थी। खनिज संपन्न राज्यों को एक अप्रैल 2005 से बकाया रॉयल्टी वसूलने की अनुमति मिली। यह बकाया राशि हजारों करोड़ रुपये है। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि यह भुगतान 1 अप्रैल 2026 से शुरू होगा। कंपनियां और केंद्र इसे 12 साल की किश्तों में चुकाएंगे। राहत की बात यह है कि 25 जुलाई 2024 से पहले के बकाये पर जुर्माना और ब्याज माफ कर दिया गया है।

यह भी पढ़ें: SC: बिहार SIR पर सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग से सवाल, पूछा- 2003 में पुनरीक्षण में कौन से दस्तावेज लिए गए थे?
 

दहेज हत्या मामला: सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी पति की जमानत रद्द की, कहा- ऐसे अपराधों को हल्के में न लें अदालतें

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के एक दहेज हत्या मामले में आरोपी पति को इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से दी गई जमानत रद्द कर दी है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि  महिलाओं के विरुद्ध होने वाले जघन्य अपराधों में जमानत देते समय अदालतों को अत्यंत संवेदनशील और सतर्क रहने की आवश्यकता है।

एक सप्ताह में आत्मसमर्पण का आदेश
शीर्ष अदालत ने मृतक महिला के पिता की अपील को स्वीकार करते हुए आरोपी पति को आदेश दिया है कि वह एक सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करे। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि वह निर्धारित समय में सरेंडर नहीं करता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

क्या है पूरा मामला?
यह मामला गाजियाबाद का है, जहां फरवरी 2019 में मृतका की शादी हुई थी। शादी के सात साल पूरे होने से पहले ही, 11 जुलाई 2024 को महिला अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई। मृतका के पिता ने एफआईआर में आरोप लगाया कि शादी में 30 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी पति और उसके ससुराल वाले संतुष्ट नहीं थे। वे लगातार एक एसयूवी गाड़ी और 10 लाख रुपये नकद की मांग कर रहे थे।

आरोप है कि मांग पूरी न होने पर महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। मौत से कुछ समय पहले महिला ने फोन पर अपने पिता को बताया था कि उसके साथ मारपीट की जा रही है और उसे जान से मारने की धमकी दी गई है।

हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अगस्त 2025 में आरोपी को इस आधार पर जमानत दी थी कि मौत का कारण फांसी के कारण दम घुटना था और एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, 'इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इतने गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में विवेक का प्रयोग करते हुए घोर त्रुटि की है। जमानत अर्जी पर विचार करते समय अपराध की प्रकृति और प्रथम दृष्टया साक्ष्यों को देखना अनिवार्य है, जिन्हें यहां नजरअंदाज किया गया।' सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में अदालतों को आगाह किया कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा और दहेज हत्या जैसे मामलों को बहुत हल्के में लेना कानून की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, देवराजा मार्केट और लैंसडाउन बिल्डिंग को गिराया नहीं जाएगा

उच्चतम न्यायालय ने मैसूरु के सौ साल से भी अधिक पुराने देवराजा मार्केट और लैंसडाउन बिल्डिंग को संरक्षित करने का निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन धरोहरों को गिराने के बजाय आवश्यक मरम्मत और जीर्णोद्धार के जरिए सुरक्षित रखा जाए।

IIT रुड़की की रिपोर्ट बनी आधार
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने चार मई को यह आदेश IIT रुड़की की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट देखने के बाद दिया। पिछले साल सितंबर में कोर्ट ने इस समिति को दोनों इमारतों की स्थिति और उनके संरक्षण की संभावनाओं के मूल्यांकन की जिम्मेदारी सौंपी थी।
  • समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दोनों इमारतें मैसूरु की नागरिक वास्तुकला का अभिन्न हिस्सा हैं।
  • इनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक है, इसलिए इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।
  • वैज्ञानिक मूल्यांकन के आधार पर एक विस्तृत कंजर्वेशन प्लान बनाकर काम शुरू करने की जरूरत है।

हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती
यह मामला कर्नाटक हाईकोर्ट के अगस्त 2023 के उस फैसले के खिलाफ दायर किया गया था, जिसमें इन इमारतों को गिराने या दोबारा बनाने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इन संरचनाओं के संरक्षण की बात कहकर हाईकोर्ट के रुख को बदल दिया है।

 
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बार काउंसिल ने सीजेआई को पत्र लिख आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज के खिलाफ की कार्रवाई की मांग
सुप्रीम कोर्ट बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) ने सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत को पत्र लिखकर आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। जज ने एक युवा वकील को 24 घंटे की न्यायिक हिरासत में भेजा था, बीसीआई ने इसे चिंताजनक घटना बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई है।

बीसीआई के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनन मिश्रा ने औपचारिक पत्र में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस तर्लाडा राजशेखर राव के आचरण को घोर अनुचित और बार के विश्वास को कमजोर करने वाला बताया। पत्र में कहा गया है कि इस पूरे घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए अदालत की कार्यवाही की वीडियो रिकॉर्डिंग, पारित आदेश और उससे जुड़े सभी तथ्यों की समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही, जज से न्यायिक कार्य अस्थायी रूप से वापस लेने, उनका स्थानांतरण और न्यायिक आचरण व कोर्ट प्रबंधन पर प्रशिक्षण देने जैसे प्रशासनिक कदमों पर भी विचार करने की अपील की गई है। बीसीआई ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा व जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है कि न्यायिक व्यवहार में निष्पक्षता, संयम और धैर्य दिखे। यह विवाद 5 मई की सुनवाई से जुड़ा है। बीसीआई के अनुसार, सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में जस्टिस राव एक युवा वकील को फटकारते नजर आते हैं, जो सुनवाई के दौरान आदेश की प्रति प्रस्तुत नहीं कर पाया। आरोप है कि वकील के बार-बार माफी मांगने व अस्वस्थता का हवाला देने के बावजूद जज ने उसे 24 घंटे की हिरासत में भेजने का निर्देश दिया।

बीसीआई ने इस कार्रवाई को अनुचित करार देते हुए कहा कि अदालत की गरिमा किसी वकील को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर बढ़ाई नहीं जा सकती। युवा वकील न्यायालय के अधिकारी होते हैं, जो सीखने की प्रक्रिया में होते हैं और उनके साथ सुधारात्मक व्यवहार होना चाहिए, न कि दंडात्मक। बीसीआई ने कहा कि इस तरह की घटनाएं विशेष रूप से युवा वकीलों के बीच भय का माहौल पैदा करती हैं और बार तथा बेंच के बीच आवश्यक आपसी सम्मान को कमजोर करती हैं।
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