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SC: शरीयत नहीं, उत्तराधिकार कानून लागू करने की मांग वाली याचिका पर 'सुप्रीम' सुनवाई, केंद्र और केरल को नोटिस

Fri, 18 Apr 2025 05:03 AM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

केरल के त्रिशूर जिले के निवासी नौशाद केके ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा कि वह इस्लाम को छोड़े बिना शरीयत के बजाय उत्तराधिकार कानून के तहत शासित होना चाहते हैं। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। साथ ही केंद्र और केरल सरकार को नोटिस जारी किया है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : PTI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने एक मुस्लिम युवक की ओर से दायर शरीयत के बजाय उत्तराधिकार कानून लागू करने की मांग वाली याचिका का संज्ञान लिया है। कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और केरल सरकार को नोटिस जारी करके याचिका पर जवाब मांगा है। 

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मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने केरल के त्रिशूर जिले के निवासी नौशाद केके की याचिका पर संज्ञान लिया। याचिका में कहा गया था कि नौशाद इस्लाम धर्म छोड़े बिना शरीयत के बजाय उत्तराधिकार कानून के तहत शासित होना चाहते हैं।

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पीठ ने इस याचिका को इस मुद्दे पर लंबित समान मामलों के साथ संलग्न करने का आदेश दिया। इससे पहले पिछले वर्ष अप्रैल में पीठ ने अलप्पुझा निवासी और एक्स-मुस्लिम्स ऑफ केरल की महासचिव सफिया पीएम की याचिका पर विचार करने पर सहमति व्यक्त की थी। मुस्लिम महिला ने याचिका में कहा था कि वह इस्लाम को नहीं मानती, लेकिन अभी भी उसने आधिकारिक रूप से इस्लाम को नहीं छोड़ा है। वह चाहती है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत उसे धर्म का अधिकार मिले और साथ ही धर्म पर विश्वास न करने का भी अधिकार मिले।

2016 में कुरान सुन्नत सोसाइटी की ओर से दायर की गई इसी तरह की एक अन्य याचिका भी शीर्ष अदालत में लंबित है। अब तीनों याचिकाओं की एक साथ सुनवाई होगी। 

सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल विकसित करें राज्य: सुप्रीम कोर्ट
 बढ़ रहे सड़क हादसों पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल विकसित करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति अभय ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को ड्राइवरों के कार्य घंटे लागू करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित विभागों की बैठकें बुलाने का भी निर्देश दिया।

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पीठ ने कहा कि हमारे देश में सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे मामले भी हैं जहां सड़क दुर्घटना के पीड़ितों को तत्काल मदद नहीं मिल पाती। कई बार पीड़ित घायल तो नहीं होते, लेकिन वाहनों में फंस जाते हैं। हमारा मानना है कि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जमीनी स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल अपनाने पर काम करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल विकसित करने के लिए छह महीने का समय दिया। यह आदेश अधिवक्ता किशन चंद जैन द्वारा दायर एक आवेदन पर आया। इसमें अपील की गई थी कि सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए एक प्रोटोकॉल होना चाहिए।


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कटारा हत्याकांड: मेडिकल बोर्ड डाकिये की तरह काम नहीं कर सकते- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नीतीश कटारा मामले में दोषी के परिजनों की स्थिति का आकलन करने के लिए गठित एम्स मेडिकल बोर्ड के लापरवाह रवैये की आलोचना की। 2002 के हत्या मामले में 25 साल की सजा काट रहे विकास यादव ने अपनी बीमार मां की देखभाल के लिए अंतरिम जमानत मांगी है। जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि एम्स की रिपोर्ट "सरसरी तौर पर" पेश की गई, बिना इस सवाल पर विचार किए कि यादव की मां की सर्जरी की जरूरत है या नहीं।

पीठ ने कहा, 'कोई भी अपना काम नहीं कर रहा है। यह बहुत ही लापरवाही भरा रवैया है। कोई भी मेडिकल बोर्ड काम करने के लिए तैयार नहीं है। एम्स द्वारा दायर मेडिकल रिपोर्ट बहुत ही लापरवाही भरी है। मेडिकल बोर्ड डाकिये की तरह काम नहीं कर सकते। वे बस वहां जाते हैं और हमें बताते हैं कि डॉक्टर ने क्या कहा है। हमें आश्चर्य है कि मेडिकल बोर्ड काम करने को तैयार नहीं है।' शीर्ष अदालत ने कहा, 'हम यशोदा अस्पताल के विपिन त्यागी को मंगलवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित रहने और अपीलकर्ता की मां की चिकित्सा स्थिति के बारे में हमें सूचित करने का निर्देश देते हैं।'

'मकसद के अभाव में बरी नहीं किया जा सकता'- सुप्रीम कोर्ट
उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि किसी मामले में मकसद के अभाव को आरोपी को बरी करने का एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने 2012 में अपने बेटे की हत्या के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए यह बात कही। न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने पिता द्वारा अपने इकलौते बेटे की हत्या की असंभावना के बारे में व्यक्ति की जोरदार दलील को 'बचकाना' बताते हुए खारिज कर दिया।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता की एक और दलील थी कि उसके बेटे की हत्या के लिए उसके पास कोई मकसद नहीं था। पीठ ने कहा, 'जिस तरह एक मजबूत मकसद अपने आप में दोषसिद्धि का कारण नहीं बनता है, उसी तरह मकसद नहीं होने का एकमात्र आधार बरी करने की वजह नहीं हो सकता है।' यह फैसला दिल्ली उच्च न्यायालय के अगस्त 2022 के फैसले को चुनौती देने वाले व्यक्ति की अपील पर आया। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा व्यक्ति को दोषी करार देने और आजीवन कारावास की सजा सुनाने के फैसले की पुष्टि की।

बीरेन सिंह की मणिपुर हिंसा में भूमिका संबंधी ऑडियो की जांच रिपोर्ट तैयार
 केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा मामले में कथित तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह की संलिप्तता संबंधी लीक ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता पर फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार है। इसे जल्द ही सीलबंद लिफाफे में दाखिल कर दिया जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र और राज्य सरकारों के वकीलों की दलीलों का संज्ञान लिया और ‘कुकी ऑर्गेनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स ट्रस्ट’ (केओएचयूआर) की याचिका की सुनवाई पांच मई को शुरू हो रहे सप्ताह में किए जाने के लिए स्थगित कर दी। वकील ने कहा कि केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (सीएफएसएल) की रिपोर्ट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दाखिल करेंगे। उन्होंने यह कहते हुए स्थगन की मांग की कि विधि अधिकारी मेहता इस समय उपलब्ध नहीं हैं। मणिपुर में बिगड़े हालात और नेतृत्व परिवर्तन की बढ़ती मांगों के बीच बीरेन सिंह ने नौ फरवरी को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।  

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने लीक ऑडियो क्लिप की प्रामाणिकता पर सीएफएसएल से सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट मांगी थी। इसमें मई 2023 में शुरू हुई जातीय हिंसा में सिंह की संलिप्तता का आरोप लगा था। केओएचयूआर की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सिंह की कथित भूमिका की अदालत की निगरानी में एसआईटी जांच की मांग की थी। सीजेआई ने कहा था कि राज्य धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है और हम इस मामले को फिलहाल स्थगित रखेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि वह बाद में देखेंगे कि मामले की सुनवाई शीर्ष अदालत करेगी या हाईकोर्ट। सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणियों से सहमति जताई थी।
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सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल बनाएं
सुप्रीम कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए बृहस्पतिवार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल बनाने का निर्देश दिया ताकि पीड़ितों को तत्काल सहायता मिल सके। शीर्ष अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल बनाने के लिए छह महीने का समय दिया।

जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को चालकों के लिए काम करने के निर्धारित घंटों की व्यवस्था लागू करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के संबंधित विभागों की बैठकें बुलाने का निर्देश भी दिया। यह आदेश अधिवक्ता किशन चंद जैन की ओर से दायर एक याचिका पर दिया गया, जिसमें आग्रह किया गया था कि सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए एक प्रोटोकॉल होना चाहिए।  

पीठ ने कहा, हमारे देश में सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके कारण अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे मामले भी हैं जहां सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तुरंत मदद नहीं मिल पाती। ऐसे भी मामले हैं जहां पीड़ितों को चोट तो नहीं लगती लेकिन वे वाहनों में फंस जाते हैं। हमारा मानना है कि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को जमीनी स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल बनाने की दिशा में काम करना चाहिए।
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