सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार करेगा कि क्या केरल हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए एक मुस्लिम युवक की हिंदू से मुस्लिम बन चुकी लड़की से शादी को निरस्त करने का अधिकार है।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविल्कर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ केरल निवासी शफीन जहां की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें उसने अपनी शादी को लव जिहाद करार देते हुए उसकी एनआईए जांच के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को चुनौती दी है।
शफीन के वकील दुष्यंत दवे ने मंगलवार को अपनी दलील में कहा कि एनआईए जांच के सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने हमारे बहुधर्मी समाज की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने इस जांच आदेश को वापस लने का आग्रह करते हुए मामले की जल्द सुनवाई की गुहार लगाई।
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इस पर पीठ ने कहा कि लव जिहाद की साजिश है या नहीं, यह तो बाद की बात है। पहले तो सवाल यह है कि क्या हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 में प्रदत्त परमादेश जारी करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए दो वयस्कों की शादी को निरस्त कर सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि 24 साल की एक लड़की के पिता को उसकी जिंदगी में दखल नहीं देना चाहिए। मालूम हो कि इससे पहले शीर्ष अदालत ने 16 अगस्त को अपने आदेश में कहा था कि एनआईए इस बात की जांच करे कि शफीन की शादी कहीं लव जिहाद की किसी बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आरवी रवींद्रन की निगरानी में यह जांच चल रही है।