उपासना स्थल कानून पर नई याचिकाओं से सुप्रीम कोर्ट नाराज
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देश की सर्वोच्च अदालत ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम पर कई नई याचिकाएं दायर होने पर नाराजगी जताई है। इस पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बहुत हो चुका, एक सीमा तक याचिकाएं दाखिल होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने जिन याचिकाओं पर अब तक नोटिस नहीं जारी हुए थे, उन्हें खारिज करते हुए कहा कि अब हस्तक्षेप याचिका भी सिर्फ वही याचिकाकर्ता दाखिल कर सकते हैं जिनके पास कोई नया आधार हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ऐसा बिंदु हो, जिसे लंबित याचिका में न उठाया गया हो। इस कानून में किसी स्थान के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त 1947 के अनुसार बनाए रखने का प्रावधान है।
अप्रैल के पहले हफ्ते में सुनवाई होगी- CJI
सीजेआई जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस पीवी संजय कुमार की पीठ ने कहा कि वह अभी इस मामले पर सुनवाई नहीं करेगी। यह तीन जजों की पीठ का मामला है। इस पर अप्रैल के पहले हफ्ते में सुनवाई होगी। पीठ ने कहा, बहुत सारी याचिकाएं दायर की गई हैं। हस्तक्षेप याचिकाओं की एक सीमा होती है। कांग्रेस पार्टी, सीपीआई (एमएल), जमीयत उलमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई राजनीतिक दलों और नेताओं ने भी इस मामले में हस्तक्षेप याचिकाएं दायर की हैं। इन सभी ने अधिनियम की वैधता का बचाव किया है और कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं का विरोध किया है।
सपा सांसद इकरा चौधरी को दी गई छूट
पीठ ने हालांकि सपा नेता और कैराना से सांसद इकरा चौधरी जैसे याचिकाकर्ताओं को (जिन्होंने हाल ही में याचिकाएं दायर की हैं और जिन पर नोटिस जारी नहीं किए गए हैं) को नए कानूनी आधारों का हवाला देकर लंबित याचिकाओं में हस्तक्षेप के लिए आवेदन करने की छूट दी। पीठ ने यह भी कहा कि अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाएं, जिनमें न्यायालय की ओर से कोई नोटिस जारी नहीं किया गया है, खारिज मानी जाएंगी। ऐसे याचिकाकर्ता मौजूदा याचिकाओं में आवेदन दायर कर सकते हैं, बशर्ते कि ऐसे आवेदन में नए आधार उठाएं।
पहले से दायर याचिकाओं के अलावा अन्य पर विचार करना असंभव- CJI
सीजेआई ने कहा, लोग इस तरह नई याचिकाएं दायर करते रहते हैं और आरोप लगाते हैं कि उन्होंने नए आधार उठाए हैं। हमारे लिए पहले से दायर की गई याचिकाओं के अलावा अन्य याचिकाओं पर विचार करना असंभव हो जाएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने पीठ से सहमति जताते हुए कहा कि इस मुद्दे पर कोई नई याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
केंद्र ने नहीं दाखिल किया जवाब
वरिष्ठ वकील विकास सिंह और अधिवक्ता निजाम पाशा ने बताया कि केंद्र सरकार ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। पाशा ने कहा, पिछली 8 तारीखें बीत चुकी हैं लेकिन केंद्र की ओर से कोई जवाबी हलफनामा दाखिल नहीं किया है। आखिर में न्यायालय ने निर्देश दिया कि मामले को अप्रैल में 3 जजों की पीठ के समक्ष मामले को सूचीबद्ध किया जाए। 1991 का कानून किसी भी उपासना स्थल के रूपांतरण पर रोक लगाता है और किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र को 15 अगस्त, 1947 को मौजूद रहने के रूप में बनाए रखने का प्रावधान करता है।