झूठी शिकायतें, फर्जी मुकदमे और मनगढ़ंत सबूतों के दम पर बेकसूर लोगों को फंसाने के बढ़ते मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त नजर आ रहा है। देश की सबसे बड़ी अदालत अगले हफ्ते एक ऐसी जनहित याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गई है, जिसमें थाना-कचहरी और सरकारी दफ्तरों में चेतावनी वाले डिस्प्ले बोर्ड लगाने की मांग की गई है। इन बोर्ड्स पर साफ-साफ लिखा होगा कि फर्जी शिकायत दर्ज कराने पर किस तरह की कानूनी कार्रवाई और सजा हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में किसने रखी बात?
गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने यह मामला उठाया गया। याचिकाकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से वकील अश्विनी दुबे ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी याचिका पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया था। अदालत ने इस अर्जी को स्वीकार करते हुए अगले सप्ताह इसे सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की सहमति दे दी है। आपको बता दें कि इस याचिका पर शीर्ष अदालत केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को पहले ही नोटिस जारी कर जवाब मांग चुकी है।
याचिकाकर्ता की क्या हैं प्रमुख मांगें?
अदालत के समक्ष दाखिल इस याचिका में कई अहम कदम उठाने की मांग की गई है। पहला, पुलिस थानों, कोर्ट परिसरों और नगर निगम दफ्तरों जैसी सभी सार्वजनिक जगहों पर बड़े चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं। दूसरा, किसी भी शिकायतकर्ता की अर्जी दर्ज करने से पहले पुलिस या अधिकारी उसे यह स्पष्ट बताएं कि झूठे आरोप लगाने, फर्जी गवाही देने या मनगढ़ंत सबूत पेश करने पर कानून में कितनी गंभीर सजा का प्रावधान है।
हलफनामे से कसेगी फर्जी मामलों पर लगाम
याचिका में एक और सबसे महत्वपूर्ण मांग हलफनामे को लेकर की गई है। इसमें कहा गया है कि किसी भी शिकायत, बयान या सबूत को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने से पहले शिकायतकर्ता से एक शपथ पत्र या हलफनामा लिया जाए। इस हलफनामे में व्यक्ति को यह लिखकर देना होगा कि उसके द्वारा दी गई सारी जानकारी पूरी तरह सच और सही है। ऐसा करने से शिकायत दर्ज कराने से पहले लोग 100 बार सोचेंगे और फर्जी मुकदमों पर लगाम लगेगी।
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सरकारी आंकड़ों से खुली पोल
अपनी दलीलों को मजबूत करने के लिए याचिका में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में कई विशेष आपराधिक कानूनों के तहत दर्ज मुकदमों और उनमें मिलने वाली सजा (कनविक्शन दर) के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। यानी दर्ज मुकदमों की तुलना में बरी होने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है। याचिका में कहा गया है कि यह पैटर्न साफ दिखाता है कि झूठे मामलों और गढ़े गए सबूतों के कारण देश की न्याय प्रणाली पर कितना भारी बोझ पड़ रहा है।
कानून बना, लेकिन अमल में देरी
याचिका में विधि आयोग की रिपोर्ट नंबर 277 का जिक्र करते हुए कहा गया है कि झूठे आरोपों और बेबुनियाद मुकदमों की वजह से निर्दोष लोगों के मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21 - जीने का अधिकार) का हनन होता है। साथ ही यह भी ध्यान दिलाया गया कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 के अध्याय XIV में इस तरह के फर्जीवाड़े से निपटने के लिए सख्त प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने इन्हें जमीन पर सही तरीके से लागू करने के लिए जरूरी और ठोस कदम नहीं उठाए हैं।