हाई कोर्ट ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था, जिसमें से गर्भ गृह की जमीन रामलला विराजमान को दी गई थी और दो अन्य हिस्से निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिए गए थे।
तीनों पक्षों ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। विश्व हिंदू परिषद का मानना है कि हाईकोर्ट से किसी ने भी विवादित जमीन का बंटवारा करने की प्रार्थना नहीं की थी। इसलिए उसका यह फैसला कानून सम्मत नहीं है।
हाईकोर्ट के 3 जजों की बेंच के सामने भी यह मामला लगभग 15 साल तक लंबित था। इस दौरान 14 जज बदल गए। लेकिन उन्होंने यह गनीमत की कि हर बार मामले की सुनवाई नए सिरे से शुरू नहीं की। दो पुराने जज के सहारे सुनवाई चलती रही। इसमें तेजी जस्टिस एस यू खान के शामिल होने के बाद आई।
उन्होंने सभी पक्षों के लिए एक समय सीमा निर्धारित कर दी जिसमें वे अपनी बहस पूरी कर सकते थे। इसी वजह से यह बेंच अपना फैसला दे सकी। चंपत राय का मानना है सुप्रीम कोर्ट भी मामले को ज्यादा लंबा न खींच कर एक समय सीमा के अंदर ही इसकी सुनवाई पूरी करेगी।
हाईकोर्ट के फैसले में जो जमीन राम मंदिर बनाने के लिए दी गई है वह महज 1400 स्क्वायर फीट है। जबकि विश्व हिंदू परिषद ने जिस भव्य मंदिर के निर्माण की तैयारी की है सिर्फ उसकी इमारत के लिए ही 36500 वर्ग फीट जमीन की जरूरत होगी। इसके अलावा परिक्रमा मार्ग और दर्शनार्थियों की सुविधाओं के लिए कम से कम इतनी ही जमीन और जरूरत होगी।
विश्व हिंदू परिषद ने हर व्यक्ति से सवा रुपये चंदा लेकर छह करोड़ लोगों से सवा आठ करोड़ रुपये जुटाये थे। उनसे मंदिर के लिए जरूरी पत्थरों में से साठ प्रतिशत पत्थर नक्काशी करके तैयार किए जा चुके हैं। हद परिषद के पास पैसे खत्म हो चुके हैं। चंपत राय का कहना था की 8 फरवरी से वह देश भर में मंदिर के लिए चंदा जुटाने का अभियान छेड़ेंगे जिससे शेष बचे हुए पत्थर भी जुटाई जा सके और निर्माण सामग्री खरीदी जा सके।