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समलैंगिकता अपराध है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच बुधवार को भी करेगी सुनवाई

Tue, 10 Jul 2018 04:43 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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समलैंगिगता को अपराध के तहत लाने वाली भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को रद्द करने की मांग पर मंगलवार को पांच न्यायाधीशों की सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने सुनवाई की। समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच तय करेगी की समलैंगिकता अपराध है या नहीं। 

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इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मामले की सुनवाई को स्थगित करने से इनकार कर दिया था। बता दें कि केंद्र सरकार इस मामले की सुनवाई अभी टालना चाहती है। जिसको लेकर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था। इस मामले की सुनवाई में पांच न्यायाधीशों में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, आरएफ नरीमन, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड़ और इंदु मल्होत्रा शामिल हैं। 

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धारा 377 को हटाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।

- सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने टिप्पणी की कि यह मामला केवल धारा 377 की वैधता से जुड़ा हुआ है। इसका शादी या दूसरे नागरिक अधिकारों से कोई लेना-देना नहीं है। वह दूसरी बहस का विषय है। 
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- तुषार मेहता ने कहा कि यह मामला धारा 377 तक सीमित रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसका शादी और संभोग के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए। 

- केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 'मैं इस मुद्दे पर चर्चा करने की प्रक्रिया में हूं, धारा 377 कानून का सवाल है।"

- रोहतगी ने कहा कि धारा 377 मानवाधिकारों का हनन करती है। समाज के बदलने के साथ ही नैतिकताएं बदल जाती हैं। हम कह सकते हैं कि 160 साल पुराने नैतिक मूल्य आज के नैतिक मूल्य नहीं होंगे।

- रोहतगी ने कहा कि पश्चिमी दुनिया में इस विषय पर शोध हुए हैं। इस तरह की यौन प्रवृत्ति के वंशानुगत कारण होते हैं।

- मुकुल रोहतगी ने कहा कि यौन रुझान और लिंग अलग-अलग चीजें हैं। यह मामला यौन प्रवृत्ति से संबंधित है। इस मामले में लिंग से कोई लेना-देना नहीं है। यौन प्रवृत्ति का मामला पसंद से भी अलग है। यह प्राकृतिक होती है। यह पैदा होने के साथ ही इंसान में आती है। 

- रोहतगी का तर्क दिया है कि धारा 377 के होने से एलजीबीटी समुदाय अपने आप को अघोषित अपराधी महसूस करता है। समाज भी इन्हें दूसरी नजरों से देखता है। इन्हें संवैधानिक प्रावधानों से सुरक्षित महसूस करना चाहिए। 

- पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बहस शुरू की। वह याचिकाकर्ताओं की ओर से धारा 377 को हटाने के लिए बहस कर रहे हैं। 

- केंद्र सरकार की ओर से दलील रखने के लिए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए। 

- इससे पहले, भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने धारा 377 को खत्म करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई पर कहा कि यह सामान्य बात नहीं है। हम इसका जश्न नहीं मना सकते। यह हिंदुत्व के खिलाफ है। अगर यह ठीक हो सकता है तो हमें मेडिकल रिसर्च में निवेश करना चाहिए। 

ये भी पढ़ें - जानिए क्या है आईपीसी की धारा 377, समलैंगिकता मामले में अबतक क्या हुआ


 

2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिकता को दी थी मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में समलैंगिक वयस्कों के बीच संबंधों को अपराध की श्रेणी में बहाल किया था। न्यायालय ने समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के दिल्ली हाईकोर्ट के 2009 के फैसले को रद्द कर दिया था। इसके बाद पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं और उनके खारिज होने पर प्रभावित पक्षों ने मूल फैसले के दोबारा अध्ययन के लिए सुधारात्मक याचिकाएं दाखिल की गईं।
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आईपीसी की धारा 377

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है। आईपीसी की धारा 377 के मुताबिक जो कोई भी किसी पुरुष, महिला या पशु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के खिलाफ सेक्स करता है तो इस अपराध के लिए उसे 10 वर्ष की सजा या आजीवन कारावास से दंडित किया जाएगा। उस पर जुर्माना भी लगाया जाएगा। यह अपराध संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और यह गैर जमानती है।
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