सार
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को मंदिर की जमीन अस्थायी ट्रस्टी से दान में लेने के मामले में गलत ठहराया और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने दान पत्र को अमान्य घोषित करते हुए जमीन का किराया 31 हजार रुपये प्रति माह तय किया। आखिर मंदिर की संपत्ति पर सरकार का अधिकार कितना है? क्या यह फैसला धार्मिक संस्थानों की जमीन और दान की सुरक्षा के लिए अहम मिसाल बनेगा? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को क्या निर्देश दिए?
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सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि राज्य सरकार किसी अस्थायी ट्रस्टी से मंदिर की जमीन उपहार में नहीं ले सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्ति की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार खुद उस संपत्ति पर कब्जा नहीं कर सकती और न ही अपने अधिकारियों को ऐसा करने की अनुमति दे सकती है। यह मामला तमिलनाडु के एक मंदिर की जमीन तमिलनाडु सरकार को दान देने से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने किस मंदिर की जमीन पर सुनाया फैसला?
यह मामला तमिलनाडु के इरोड जिले के कोडुमुडी गांव में स्थित नागापलायम मरिअम्मन-पोननाचियम्मन मंदिर की जमीन से जुड़ा है। मंदिर की एक एकड़ और दस सेंट जमीन सर्वे नंबर 36/4, 36/5 और 41/2 में दर्ज थी। इस जमीन का प्रबंधन मंदिर ट्रस्ट करता था। 30 अगस्त 2017 को तहसीलदार ने एक प्रमाणपत्र जारी किया, जिसमें कहा गया कि मंदिर के अस्थायी ट्रस्टी एस भूपति ने यह जमीन सरकार को दे दी है। इसी दिन दान पत्र बनाया गया और तमिलनाडु सरकार की ओर से तहसीलदार ने इसे स्वीकार कर लिया। जमीन पर तालुक कार्यालय बनाने की योजना थी।
जमीन के दान को अदालत में क्यों चुनौती दी गई?
एम पेरियासामी समेत चार लोगों ने इस दान पत्र को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि मंदिर ट्रस्ट की जमीन को दान के रूप में सरकार को देना तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 34 का उल्लंघन है। इसलिए यह दान गैरकानूनी और अमान्य है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि सरकार की जिम्मेदारी मंदिर की संपत्ति की संरक्षक के तौर पर काम करना है। इसके बावजूद सरकार ने जमीन का दान स्वीकार किया और हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक उसका बचाव भी किया।
सुप्रीम कोर्ट ने दान पत्र और सरकार की भूमिका पर क्या कहा?
न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने दान पत्र को शून्य और अमान्य घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 की धारा 41(1) के तहत यह दान पत्र कानूनी रूप से प्रभावहीन है। पीठ ने सरकार को मंदिर को एक लाख रुपये का जुर्माना देने का निर्देश भी दिया। यह राशि आठ सप्ताह के भीतर जमा करनी होगी। अदालत ने कहा कि धार्मिक संस्थानों की संपत्ति भक्तों के चढ़ावे और दान से सदियों में जमा होती है। ऐसी संपत्ति देवता की होती है और ट्रस्टी या सरकार उसे केवल संरक्षक के रूप में संभाल सकते हैं।
मंदिर की जमीन के पट्टे और किराये पर क्या आदेश दिया गया?
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के पक्ष में जमीन के पट्टे को रद्द नहीं किया है। अदालत ने कहा कि यदि पट्टे की अवधि समाप्त हो चुकी है तो उसे फिर से जारी किया जाए। हालांकि, किराया बढ़ाकर आठ मार्च 2019 से 31 हजार रुपये प्रति माह कर दिया गया है। इसी तारीख को जमीन निर्माण के लिए सौंपी गई थी। अदालत ने यह भी कहा कि 1959 के कानून की धारा 34-ए के तहत हर तीन साल में किराये की दोबारा समीक्षा की जाएगी, लेकिन किराया 31 हजार रुपये प्रति माह से कम नहीं होगा। पट्टे की अवधि, नवीनीकरण और बाकी शर्तें मंदिर ट्रस्ट तय करेगा। इसमें मंदिर का हित सबसे ऊपर रखा जाएगा।