सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य लोगों से एक याचिका पर जवाब मांगा। इस याचिका में 1980 के उस कानून के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत राज्य के मौजूदा और पूर्व एमएलए और एमएलसी को पेंशन और दूसरी सुविधाएं मिलती हैं।
लखनऊ बेंच के किस फैसले को दिया चुनौती?
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। इस याचिका में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के इस साल मई में दिए गए फैसले को चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने 'उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980' के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा है?
हाई कोर्ट ने कहा था कि ये प्रावधान मौजूदा और पूर्व एमएलए और एमएलसी को कई तरह के वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाएं देते हैं। साथ ही उनके जीवनसाथी, परिवार के सदस्यों और साथी को पेंशन, पारिवारिक पेंशन, मुफ्त यात्रा, चिकित्सा सुविधाएं और दूसरी सुविधाएं भी देते हैं।
याचिका में क्या कहा गया है?
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। सुनवाई के लिए इसे चार हफ्ते बाद की तारीख दी। याचिकाकर्ता 'लोक प्रहरी' ने हाई कोर्ट में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की थी कि राज्य विधानसभा ने असल में खुद को ही अपने मामले का जज बना लिया है। अपने और अपने पूर्व सदस्यों को ऐसे फायदे दिए हैं जो साफ तौर पर मनमाने हैं। उस बुनियादी संवैधानिक विचार के खिलाफ हैं जिसके अनुसार सार्वजनिक पद जनसेवा के लिए होता है, न कि निजी फायदे के लिए।
हाई कोर्ट ने कहा था, 'रिट याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह है कि ये सभी प्रावधान भारत के संविधान के अनुच्छेद 195 द्वारा दी गई सीमित शक्तियों से कहीं आगे जाते हैं। यह अनुच्छेद केवल सदस्यों के वेतन और भत्तों की बात करता है। इसमें पेंशन, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों, परिवार/साथी के लिए सुविधाओं या 'अन्य सुविधाओं' का कोई जिक्र नहीं है।'
हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर क्या कहा था?
संविधान का अनुच्छेद 195 किसी राज्य की विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों के वेतन और भत्तों से संबंधित है। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता की चुनौती असल में किसी साबित हो सकने वाली संवैधानिक कमी के बजाय नीतिगत असहमति पर आधारित थी। याचिका को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा था, 'राज्य विधानसभा पर अपने 'सदस्यों' और 'पूर्व सदस्यों' के लिए सामाजिक सुरक्षा का कोई उपाय लागू करने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है।'