सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बिना ठोस नियम या अधीनस्थ कानून बनाए पर्यावरण क्षतिपूर्ति नहीं वसूल सकते। जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि इसके लिए एक तय प्रक्रिया जरूरी है। केंद्र सरकार इस मुद्दे पर नया कानून लाने पर विचार कर रही है। अदालत ने साफ किया कि जब तक नियम न हों, तब तक मनमाने तरीके से जुर्माना नहीं लिया जा सकता। आइए, मामले की सुनवाई को विस्तार से जानते हैं...
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को पर्यावरण और प्रदूषण से जुड़ा एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा है कि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बिना किसी तय नियम या अधीनस्थ कानून के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों से पर्यावरण क्षतिपूर्ति (हर्जाना या जुर्माना) नहीं वसूल सकते हैं। अदालत के अनुसार, इसके लिए पहले एक उचित प्रक्रिया और नियम तय करना बहुत ही ज्यादा जरूरी है।
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जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि कोई भी राज्य का प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अपनी मर्जी से किसी पर भी जुर्माना नहीं थोप सकता है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि वे पर्यावरण को बचाने और प्रदूषण को रोकने के लिए जल्द ही एक नया और सख्त कानून लाने पर विचार कर रहे हैं। सर्वोच्च अदालत को यह बात इसलिए साफ करनी पड़ी क्योंकि देश के कई हाईकोर्ट ने बिना स्पष्ट कानून बने इस तरह का जुर्माना वसूलने पर रोक लगाने वाले आदेश पारित कर दिए थे।
अदालत में केंद्र सरकार और याचिकाकर्ता ने क्या बड़ी दलील दी?
अदालत में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने पीठ को बताया कि इस पूरे मामले पर सरकार बहुत ही ऊंचे स्तर पर विचार-विमर्श कर रही है और एक नया कानून लाने की पूरी तैयारी चल रही है। वहीं, इस मामले में याचिकाकर्ता 'दिल्ली पोल्यूशन कंट्रोल कमेटी' की ओर से पेश वकील ने भी अपनी जोरदार दलील दी। वकील ने मांग की कि जब तक नए नियम नहीं बन जाते, तब तक किसी भी प्रदूषण फैलाने वाले व्यक्ति या संस्था को बिना सजा के या नियमों की कमी का फायदा उठाकर बच निकलने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दी जानी चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई कब होगी और पुराने फैसले में क्या कहा गया था?
सुप्रीम कोर्ट ने इस बेहद ही अहम मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 अगस्त की तारीख तय की है। इसके साथ ही, अदालत ने अपने पिछले साल 4 अगस्त के एक पुराने फैसले का भी उल्लेख किया। उस अहम फैसले में यह कहा गया था कि जल और वायु अधिनियम की धारा 33ए और 31ए के तहत प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए क्षतिपूर्ति राशि या बैंक गारंटी की मांग कर सकते हैं। लेकिन, अदालत ने तब भी यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि ऐसी शक्तियों का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब इसके लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए एक विस्तृत प्रक्रिया अधीनस्थ कानून के जरिये तय की गई हो।