सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र को चार महीने के अंदर एक राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग गठित करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधिकरण सदस्यों और पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों से संबंधित न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख प्रावधानों को रद्द कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने न्यायाधिकरणों पर कार्यपालिका के बहुत ज्यादा नियंत्रण पर चिंता जताई। सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के न्यायाधिकरणों के कामकाज, संरचना और सेवा शर्तों में व्यापक बदलाव लाने वाले न्यायाधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्तें) अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।
पीठ ने कहा, "हम केंद्र सरकार को राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग स्थापित करने के लिए इस फैसले की तारीख से चार महीने का समय देते हैं।" फैसले में कहा गया, "इस तरह के आयोग का गठन एक जरूरी संरचनात्मक सुरक्षा उपाय है जिसे देश भर के न्यायाधिकरणों की नियुक्ति, प्रशासन और कामकाज में स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए डिजाइन किया गया है।"
अधिनियम की धारा 3 से 7 और 33 के साथ-साथ एक दर्जन से ज्यादा केंद्रीय कानूनों में किए गए कई संशोधनों पर ये चुनौतियां केंद्रित थीं। 137 पन्नों के फैसले में सीजेआई गवई ने साफ तौर से इन प्रावधानों को अमान्य करार दिया। इनमें से एक धारा 3 थी, जिसमें न्यायाधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए न्यूनतम आयु 50 वर्ष निर्धारित की गई थी।
फैसले में कहा गया कि इस प्रतिबंध ने मनमाने ढंग से युवा और सक्षम अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों को इससे बाहर रखा। इसने अधिनियम की धारा 5 को भी रद्द कर दिया, जिसमें न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों का कार्यकाल चार वर्ष निर्धारित किया गया था।
इसने धारा 3 के तहत न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए चयन प्रक्रिया को भी रद्द कर दिया और खोज-सह-चयन समिति (SCSC) को प्रत्येक रिक्ति के लिए दो नामों के एक पैनल की सिफारिश करने के लिए बाध्य किया। अधिकांश न्यायाधिकरणों में, SCSC की अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनकी ओर से नामित सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश करते हैं।
इस समिति में दो केंद्रीय सचिव और एक अतिरिक्त सदस्य भी शामिल होता है, जो आमतौर पर न्यायाधिकरण का निवर्तमान या वर्तमान अध्यक्ष होता है. अगर वर्तमान अध्यक्ष पुनर्नियुक्ति चाहता है, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश की ओर से नामित सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश को अतिरिक्त सदस्य के रूप में कार्य करना होगा।
पीठ ने फैसला सुनाया कि नियुक्तियों में एससीएससी को प्रत्येक पद के लिए केवल एक नाम की सिफारिश करनी चाहिए। पीठ ने सेवा शर्तों से संबंधित अधिनियम की धारा 7 को भी अस्वीकार कर दिया। इसने न्यायाधिकरण के सदस्यों के भत्तों और सेवा शर्तों को सिविल सेवकों के समान माना।
धारा 6, पहले से दी गई सेवाओं पर उचित विचार करते हुए अध्यक्षों और सदस्यों की पुनर्नियुक्ति की अनुमति देती है। पुनर्नियुक्तियों में भी नई नियुक्तियों की तरह ही एससीएससी-आधारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।