सुप्रीम कोर्ट ने इस बात की चिंता जताई कि कुछ उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश अपने दायित्वों का निर्वहन सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। शीर्ष अदालत में दो जजों की खंडपीठ ने कहा, हाईकोर्ट जजों के कामकाज का 'मूल्यांकन' आवश्यक है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, अदालत न्यायाधीशों के लिए 'स्कूल के प्रिंसिपल' जैसा व्यवहार नहीं करना चाहती, लेकिन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें न्यायाधीश स्वयं अपने कार्य प्रबंधन की जिम्मेदारी निभाएं। उनकी मेज पर फाइलें अनावश्यक रूप से लंबित नहीं रहनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने आत्ममंथन पर दिया जोर
सोमवार को पीठ ने कहा कि कई न्यायाधीश दिन-रात काम करते हुए भी मामलों का उत्कृष्ट तरीके से निपटारा करते हैं, लेकिन कुछ न्यायाधीश किसी कारणवश अपेक्षानुसार काम नहीं कर पाते। उदाहरण देते हुए अदालत ने कहा, अगर कोई न्यायाधीश एक दिन में एक आपराधिक अपील निपटाता है, तो यह भी बड़ी उपलब्धि है। लेकिन अगर कोई न्यायाधीश जमानत वाले मामले में भी प्रतिदिन सिर्फ एक ही मामले पर निर्णय लेता है, तो यह आत्ममंथन का विषय है।
कुछ उच्च न्यायालयों ने निर्धारित प्रारूप में डाटा मुहैया नहीं कराए
सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता फौजिया शकील ने देश के अलग-अलग उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की स्थिति पर ब्योरा पेश करते हुए कहा, कुछ उच्च न्यायालयों ने निर्धारित प्रारूप में डेटा उपलब्ध नहीं कराए हैं। इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने उन्हें दो सप्ताह के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने को कहा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सहायता के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत सिन्हा को भी नियुक्त किया।
मुकदमों की सुनवाई को बार-बार स्थगित करते हैं...
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, कुछ न्यायाधीशों की आदत है कि वे मुकदमों की सुनवाई को बार-बार स्थगित करते रहते हैं, जिससे उनकी छवि भी प्रभावित होती है। उन्होंने जोर दिया कि हर न्यायाधीश के पास 'स्व-प्रबंधन प्रणाली' होनी चाहिए ताकि मामले अनावश्यक रूप से लंबित न हों।
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पांच दिनों की समयसीमा का पालन करना अनिवार्य है
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि कुछ पुराने मुकदमों में उसने जो आदेश पारित किए हैं, उनमें साफ किया जा चुका है कि जब मुकदमे में निर्णय का ऑपरेटिव हिस्सा सुनाया जाता है, तो उसका कारण पांच दिनों के भीतर बताया जाना चाहिए। इस समयसीमा के बदले जाने तक उच्च न्यायालय को इसका पालन करना अनिवार्य है।
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आजीवन कारावास और मृत्युदंड से जुड़े मुकदमे... झारखंड हाईकोर्ट से जुड़ा मामला
गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने जिस मामले में यह टिप्पणी की है, वह झारखंड उच्च न्यायालय से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि झारखंड हाईकोर्ट ने कुछ गंभीर आपराधिक अपीलों पर वर्षों तक आदेश सुरक्षित रखने के बाद भी फैसला नहीं सुनाया। इन मामलों में आजीवन कारावास और मृत्युदंड से जुड़े मुकदमे शामिल थे। शीर्ष कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद हाईकोर्ट ने निर्णय सुनाए थे और कई दोषियों को बरी कर दिया था।