सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को केंद्र की उस याचिका पर विचार करने के लिए तैयार हो गया, जिसमें सिविल सेवा परीक्षा 2025 के उम्मीदवारों पर ओबीसी क्रीमी लेयर के मानदंड से जुड़े 11 मार्च के फैसले को लागू करने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आर महादेवन की पीठ ने केंद्र की याचिका पर नोटिस जारी किया है। अदालत ने संबंधित पक्षों से 17 सितंबर तक अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। वहीं, केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस साल 11 मार्च के फैसले को लागू करने में व्यावहारिक दिक्कतें सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि सिविल सेवा परीक्षा के उम्मीदवार अपनी पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं और फैसले को इस स्तर पर लागू करने से वे प्रभावित हो सकते हैं।
याचिका की स्वीकार्यता पर उठी शुरुआती आपत्ति
कुछ मूल याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े और पी. विल्सन ने केंद्र की ओर से दायर याचिका की स्वीकार्यता यानी मेंटेनेबिलिटी पर शुरुआती आपत्ति जताई। हेगड़े ने कहा कि केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए विविध आवेदन दायर किया है, जबकि यह समीक्षा याचिका नहीं है।
'आपत्ति पर अपना पक्ष रखेंगे'
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र के पक्ष में कई न्यायिक फैसले हैं। उन्होंने कहा कि यदि विरोधी पक्ष याचिका की स्वीकार्यता का मुद्दा उठाते हैं, तो केंद्र इस पर अपना पक्ष रखेगा। पीठ ने कहा कि वह मामले की सुनवाई 17 सितंबर को करेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता उस दिन याचिका की स्वीकार्यता से जुड़ा मुद्दा उठा सकते हैं। इससे पहले 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 11 मार्च के फैसले को लागू करने को लेकर केंद्र की ओर से मांगे गए स्पष्टीकरण पर सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ का गठन किया जाएगा।
DoPT ने 958 उम्मीदवारों के सेवा आवंटन की अनुमति मांगी
डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) ने सुप्रीम कोर्ट से सरकार को यह निर्देश देने की मांग की है कि UPSC की ओर से CSE-2025 के लिए अनुशंसित 958 उम्मीदवारों के सेवा आवंटन (Service Allocation) की प्रक्रिया 11 मार्च के फैसले से पहले लागू OBC क्रीमी लेयर निर्धारण के आधार पर आगे बढ़ाई जा सके। DoPT की याचिका 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले से जुड़ी है।
11 मार्च के फैसले में क्या कहा गया था?
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को कई अहम टिप्पणियां की थीं। अदालत ने कहा था कि 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र OBC क्रीमी लेयर की पहचान से संबंधित 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता की केवल सैलरी या आय को OBC क्रीमी लेयर से बाहर रखने का एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता। इसके बजाय माता-पिता के पद का स्तर और उसकी श्रेणी, साथ ही निर्धारित आय/संपत्ति परीक्षण, 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार देखा जाना चाहिए।
CSE-2025 पर फैसला लागू करने में केंद्र को क्यों है परेशानी?
केंद्र सरकार ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन करने के लिए बाध्य है। हालांकि, उसका कहना है कि CSE-2025 की प्रक्रिया में इस फैसले को बिना किसी संक्रमण व्यवस्था के लागू करने से ऐसे उम्मीदवारों के साथ असमान व्यवहार हो सकता है, जो समान परिस्थितियों में थे, लेकिन परीक्षा के समय लागू कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अलग-अलग तरीके से आवेदन किया था।
22 जनवरी 2025 को जारी हुआ था परीक्षा का नोटिफिकेशन
केंद्र की याचिका के मुताबिक, CSE-2025 का नोटिफिकेशन 22 जनवरी 2025 को जारी किया गया था। प्रारंभिक परीक्षा 25 मई 2025 को हुई, जबकि मुख्य परीक्षा 22 से 31 अगस्त 2025 के बीच आयोजित की गई थी। UPSC ने 6 मार्च 2026 को अंतिम परिणाम घोषित किया और IAS, IFS, IPS तथा अन्य केंद्रीय सेवाओं में नियुक्ति के लिए 958 उम्मीदवारों की सिफारिश की। इसके ठीक पांच दिन बाद, 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने 'रोहित नाथन' मामले में अपना फैसला सुनाया।
PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों को लेकर केंद्र की दलील
केंद्र सरकार ने बताया है कि जिन उम्मीदवारों के माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) या निजी क्षेत्र में कार्यरत थे और उनकी आय उस समय निर्धारित सीमा से अधिक थी, वे उस समय लागू नियमों के तहत खुद को OBC नॉन-क्रीमी लेयर लाभ के लिए अयोग्य मान सकते थे। याचिका में कहा गया है कि ऐसे कुछ उम्मीदवारों ने संभवतः CSE-2025 की परीक्षा केवल सामान्य (General) श्रेणी में दी हो। वहीं, कुछ उम्मीदवारों ने OBC श्रेणी के तहत आवेदन ही नहीं किया होगा।
OBC उम्मीदवारों को मिलने वाले लाभ भी नहीं लिए होंगे
केंद्र का कहना है कि ऐसे उम्मीदवारों ने OBC नॉन-क्रीमी लेयर उम्मीदवारों को मिलने वाले लाभ भी नहीं लिए होंगे। इनमें अधिकतम आयु सीमा में तीन वर्ष की छूट और अतिरिक्त प्रयास का अवसर शामिल है। सरकार के मुताबिक, जिन उम्मीदवारों ने OBC श्रेणी के तहत आवेदन किया था, लेकिन बाद में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया, उन्हें 11 मार्च के फैसले के आधार पर नए सिरे से मूल्यांकन का लाभ मिल सकता है।
जिन्होंने OBC के तौर पर आवेदन ही नहीं किया, उनका क्या?
केंद्र ने अपनी याचिका में कहा है कि जिन उम्मीदवारों ने कभी OBC उम्मीदवार के तौर पर आवेदन ही नहीं किया, उन्हें अब अपनी श्रेणी बदलने या पिछली तारीख से आयु सीमा में छूट अथवा अतिरिक्त प्रयास का दावा करने का अवसर नहीं दिया जा सकता। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे दो समूहों के उम्मीदवारों के साथ अलग-अलग व्यवहार की स्थिति पैदा हो सकती है, जिन्होंने उस समय लागू एक जैसी प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा करके परीक्षा में हिस्सा लिया था।
क्रीमी लेयर की दोबारा जांच से खुल सकती है पूरी प्रक्रिया
याचिका में कहा गया है कि इस स्तर पर क्रीमी लेयर का निर्धारण दोबारा शुरू करने के लिए सीमांत यानी बॉर्डरलाइन मामलों वाले उम्मीदवारों के माता-पिता की नौकरी, पद और उसके स्तर की नए सिरे से जांच करनी होगी। केंद्र का कहना है कि जिन उम्मीदवारों ने कभी OBC श्रेणी के तहत आवेदन नहीं किया, उन पर भी ऐसी प्रक्रिया लागू करने का अर्थ पूरी परीक्षा प्रक्रिया को दोबारा खोलना हो सकता है।
सेवा आवंटन में देरी का प्रशिक्षण पर भी पड़ेगा असर
केंद्र ने मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में CSE-2025 बैच के लिए जल्द शुरू होने वाले फाउंडेशन कोर्स का भी उल्लेख किया है। यह प्रशिक्षण अगस्त के आखिरी सप्ताह में शुरू होने की संभावना बताई गई है। याचिका में कहा गया है कि सेवा आवंटन को अंतिम रूप देने में किसी भी तरह की देरी का असर प्रशिक्षण कार्यक्रम पर पड़ सकता है। इसके अलावा IAS और IPS अधिकारियों के कैडर आवंटन, उनकी वरिष्ठता और वेतन निर्धारण तथा अन्य केंद्रीय सेवाओं के प्रशिक्षण कैलेंडर पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
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केंद्र ने 'Prospective Overruling' के सिद्धांत का दिया हवाला
केंद्र सरकार ने 'Prospective Overruling' यानी किसी न्यायिक फैसले के प्रभाव को भविष्य की प्रक्रियाओं पर लागू करने के सिद्धांत का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से इस पहलू पर विचार करने का आग्रह किया है। केंद्र का तर्क है कि CSE-2025 की चयन प्रक्रिया 11 मार्च के फैसले से पहले ही पूरी हो चुकी थी। ऐसे में उम्मीदवारों ने उस समय लागू कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था के आधार पर ही अपने फैसले लिए और परीक्षा प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट करे कि 11 मार्च के फैसले को CSE-2025 की पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया पर किस तरह लागू किया जाए, ताकि उम्मीदवारों के अधिकारों और सेवा आवंटन की प्रक्रिया को लेकर पैदा हुई व्यावहारिक दिक्कतों का समाधान किया जा सके।