सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया है, जिसमें हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड और राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के बीच चल रही मध्यस्थता प्रक्रिया को रोक दिया था। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अपने ही आदेश को बाद में अमान्य नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पटना हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया है, जिसने बिहार की एक बड़ी निर्माण परियोजना से जुड़ी मध्यस्थता प्रक्रिया को रोक दिया था। कोर्ट ने साफ कहा कि न्यायिक आदेशों की निश्चितता और मध्यस्थता प्रक्रिया की विश्वसनीयता के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जा सकती। अदालत सोन नदी पर पुल बनने के मामले में सुनवाई कर रही थी।
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शीर्ष अदालत ने हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड और बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के बीच चल रही मध्यस्थता में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को गलत ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट स्वयं 2021 में मध्यस्थ नियुक्त कर चुका था और दोनों पक्ष तीन साल तक 70 से अधिक सुनवाई में शामिल रहे थे।
हाईकोर्ट की गलती पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट बाद में अपने ही आदेश को निरस्त नहीं कर सकता, खासकर तब जब उसने दो बार मध्यस्थ का कार्यकाल भी बढ़ाया हो। बेंच ने इसे न्यायिक प्रक्रिया की निश्चितता और पक्षकारों के भरोसे के लिए घातक बताया।
राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड की लापरवाही
बेंच ने राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड की भूमिका पर भी सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि एक सरकारी संस्था द्वारा अपील में नोटिस मिलने के बाद भी चुप रहना सार्वजनिक दायित्वों का उल्लंघन है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसी उदासीनता पर व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सकती है।
कोर्ट का 'सुप्रीम' अल्टीमेटम
कोर्ट ने दो हफ्तों के भीतर नया मध्यस्थ नियुक्त करने का आदेश दिया, ताकि प्रक्रिया वहीं से आगे बढ़े जहां से रुकी थी। यह मामला सोन नदी पर बनने वाले एक बड़े पुल के निर्माण अनुबंध से जुड़ा है। कंपनी को 2014 में यह काम मिला था, और विवादों के बाद दोनों पक्ष मध्यस्थता के लिए सहमत हुए थे। लेकिन 2024 में राज्य पुल निर्माण निगम ने अचानक हाईकोर्ट में समीक्षा याचिका दायर कर प्रक्रिया को रोक दिया, जिसके बाद कंपनी शीर्ष अदालत पहुंच गई।