सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दो दशक पुराने ‘हिंदुत्व’ के अपने फैसले पर दोबारा सुनवाई शुरू करने के दौरान अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की मदद लेने से इनकार कर दिया। इस सुनवाई में कोर्ट उस चुनावी कानून पर आधिकारिक घोषणा करेगा, जिसके तहत भ्रष्ट आचरण के तौर पर चुनावी फायदे के लिए धर्म के दुरुपयोग का जिक्र है।
मामले पर चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर की अध्यक्षता में सात सदस्यीय बेंच ने सुनवाई शुरू कर दी। इस क्रम में इसने इस मामले के कुछ पक्षकारों के उस अनुरोध को ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कोर्ट की मदद के लिए इसमें अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को भी शामिल किया जाए। बेंच में जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस ए के गोयल, जस्टिस यू यू ललित, डी वाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव शामिल हैं।
हिंदुत्व के मुद्दे की बेंच दोबारा जांच कर सकती है। लिहाजा बेंच ने जानना चाहा कि क्या इस मामले से जुड़े कुछ मुद्दों को पांच या तीन जजों की छोटी बेंच को भेजा जा सकता है।सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने सुनवाई में शुरुआती पहल करते हुए अपने मुवक्किल भाजपा नेता अभिराम सिंह का मामला पेश किया। उन्होंने कहा कि अभिराम सिंह के मामले को इस मुद्दे की सुनवाई से अलग रखा जाए क्योंकि इस तरह की परिस्थिति वाले सभी लोगों को पहले ही सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल चुकी है।
उन्होंने कहा कि 1990 में महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए अभिराम के चुनाव को 1991 में बांबे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था। उन्होंने इसके खिलाफ 1992 में अपील दाखिल की। लेकिन उनकी अपील नारायण सिंह की मुख्य याचिका के साथ नत्थी कर दी गई और इसे पांच सदस्यीय बेंच ने सात सदस्यीय बेंच को सुपुर्द कर दिया। दातार ने कहा कि हाई कोर्ट ने अभिराम सिंह का चुनाव इस आधार पर खारिज किया था कि उन्होंने वोट जुटाने के लिए अपने भाषणों में धर्म का उदाहरण दिया था। उन्होंने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी का हवाला दिया और कहा कि उनके मामले में दिए गए फैसले में कोई विरोधाभास नहीं था। इस तरह 1990 में शिवसेना के नेता बाल ठाकरे और प्रमोद महाजन ने शिवसेना और भाजपा के लिए हिंदुत्व के नाम पर वोट मांगे थे।