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क्या मुस्लिम नहीं कर सकेंगे एक से ज्यादा शादी?: बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने की सुनवाई, केंद्र से मांगा जवाब

Fri, 31 Jul 2026 07:33 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की प्रथा को असंवैधानिक घोषित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है और सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं और याचिका में क्या-क्या मांगें की गई हैं? आइए सबकुछ विस्तार से जानते हैं...
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मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह की प्रथा को असंवैधानिक घोषित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ ने महिला अधिकार कार्यकर्ता जकिया सोमन, नूरजहां सफिया नियाज और अन्य की याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। अदालत ने इस याचिका को पहले से लंबित समान मामलों के साथ जोड़ दिया है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है।

क्या है याचिका की मुख्य मांग?

याचिका में मांग की गई है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82, जो द्विविवाह (बिगैमी) को दंडनीय अपराध मानती है, उसे सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किया जाए। इसके लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मिलने वाली छूट को समाप्त करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार से कानून बनाकर बहुविवाह की प्रथा को समाप्त करने और इसे शुरुआत से ही अमान्य (वॉइड एब इनिशियो) घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि कानून सभी धर्मों के नागरिकों के लिए समान होना चाहिए।

मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर क्या मांगें उठाई गईं?

याचिका में मुस्लिम महिलाओं के कानूनी अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई अन्य निर्देश भी मांगे गए हैं। इसमें सभी मुस्लिम विवाह और तलाक का राज्य सरकारों के पास अनिवार्य पंजीकरण कराने की मांग शामिल है, ताकि गुप्त रूप से दूसरी शादी करने की घटनाओं पर रोक लग सके। इसके अलावा पहली पत्नी और उसके बच्चों को वैवाहिक घर में तत्काल अधिकार देने तथा बहुविवाह से जुड़े मामलों में भरण-पोषण के लिए फास्ट ट्रैक व्यवस्था बनाने की भी मांग की गई है। याचिका अनुच्छेद 32 के तहत जनहित में दाखिल की गई है, जिसका उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना बताया गया है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ को क्यों दी गई चुनौती?

अधिवक्ता श्रिया मैनी के माध्यम से दायर याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान बहुविवाह को मान्यता देता है, जिससे ऐसी कानूनी स्थिति बनती है कि मुस्लिम महिलाओं को वह सुरक्षा नहीं मिलती जो बीएनएस की धारा 82 के तहत अन्य नागरिकों को मिलती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब अन्य सभी भारतीय नागरिकों के लिए द्विविवाह अपराध है, तब मुस्लिम पुरुषों को धार्मिक आधार पर इससे छूट देना कानून में असमानता पैदा करता है। उनके अनुसार यह व्यवस्था संविधान की समानता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

याचिकाकर्ताओं ने संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर क्या तर्क दिए?

याचिका में कहा गया है कि बहुविवाह महिलाओं और बच्चों को गहरा मानसिक, शारीरिक और आर्थिक नुकसान पहुंचाता है तथा सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसमें यह भी कहा गया है कि यह प्रथा कई बार तीन तलाक खत्म होने के बाद बने कानूनी सुरक्षा प्रावधानों से बचने का माध्यम बन जाती है और महिलाओं के परित्याग तथा आर्थिक बदहाली का कारण बनती है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। उनका तर्क है कि बहुविवाह इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं बल्कि अनुमति वाली व्यवस्था है, जो कुरान में बताए गए 'पूर्ण न्याय' की शर्त से जुड़ी है और उसे व्यवहार में पूरा करना मानवीय रूप से संभव नहीं बताया गया है।

अन्य देशों और समान नागरिक संहिता पर क्या जिक्र किया?

याचिका में कहा गया है कि ट्यूनीशिया और तुर्की जैसे कई मुस्लिम बहुल देशों ने बहुविवाह की प्रथा समाप्त कर दी है। इसलिए भारत में भी इसे असंवैधानिक घोषित कर सभी नागरिकों पर द्विविवाह संबंधी कानून समान रूप से लागू किया जाना चाहिए, ताकि लैंगिक न्याय और गरिमा सुनिश्चित हो सके। याचिका में संविधान के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 44 का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की परिकल्पना की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बहुविवाह की प्रथा इस उद्देश्य के विपरीत है और सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक कानून की भावना को कमजोर करती है।
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