सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि मुसलमानों में तलाक-ए-हसन की प्रथा प्रथम दृष्टया अनुचित नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि वह नहीं चाहता कि यह मुद्दा किसी अन्य कारण से एजेंडा बने। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने मौखिक रूप से कहा, 'प्रथम दृष्टया यह (तलाक-ए-हसन) इतना अनुचित नहीं है। महिलाओं के पास भी एक विकल्प है... खुला है।'
तलाक-ए-हसन में तीन महीने की अवधि में एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा महीने में एक बार तलाक का उच्चारण किया जाता है। यदि इस अवधि के दौरान सहवास फिर से शुरू नहीं किया जाता है तो तीसरे महीने में तीसरे उच्चारण के बाद तलाक को औपचारिक रूप दिया जाता है। हालांकि यदि तलाक के पहले या दूसरे उच्चारण के बाद सहवास फिर से शुरू हो जाता है तो माना जाता है कि दोनों पक्षों के बीच सुलह हो गई है। तलाक के पहले अथवा दूसरे उच्चारण को अमान्य माना जाता है।
'खुला' एक ऐसी प्रक्रिया है जो एक महिला को पति को तलाक देने की अनुमति देती है, दहेज (मेंहर) या कुछ अन्य चीजें जो उसके अपने पति से प्राप्त की गई चीजों को लौटाकर या पति-पत्नी के समझौते के अनुसार कुछ भी लौटाए बिना।
गाजियाबाद निवासी बेनजीर हीना द्वारा तलाक-ए-हसन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए पीठ ने कहा कि वह याचिकाकर्ता से सहमत नहीं है। हीना ने 'एकतरफा और अतिरिक्त न्यायिक तलाक-ए-हसन' का शिकार होने का दावा किया है।
जस्टिस कौल ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पिंकी आनंद से कहा, 'प्रथम दृष्टया, मैं याचिकाकर्ताओं से सहमत नहीं हूं और मैं नहीं चाहता कि यह किसी अन्य कारण से एजेंडा बने।' वरिष्ठ वकील आनद का कहना था कि ट्रिपल तलाक(तीन तलाक) को शीर्ष अदालत ने असंवैधानिक करार दिया था लेकिन तलाक-ए-हसन के मुद्दे को अनिर्णीत छोड़ दिया था।
पीठ ने यह भी बताया कि महिलाओं के पास भी 'खुला' के माध्यम से एक समान विकल्प होता है और अदालतों ने विवाह के अपरिवर्तनीय टूटने के मामले में आपसी सहमति से तलाक भी दिया है। पीठ ने कहा, 'यह तीन तलाक नहीं है। अगर दो लोग एक साथ नहीं रह सकते हैं तो हम शादी के 'अपरिवर्तनीय टूट' के आधार पर भी तलाक दे रहे हैं।'
पीठ ने वकील से पूछा कि क्या याचिकाकर्ता आपसी सहमति से तलाक के लिए तैयार है,शर्त यह है कि मेहर का ध्यान रखा जाए। जिनके बाद वकील ने निर्देश लाने के लिए पीठ से समय मांगा। पीठ ने आग्रह को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई अगली तारीख 29 अगस्त मुकर्रर कर दी।
हीना ने अपनी याचिका में कहा कि यह प्रथा कई महिलाओं और उनके बच्चों, खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से संबंधित लोगों के जीवन पर कहर बरपाती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि उसके मामले में पुलिस व अन्य अथॉरिटी ने यह कहते हुए शिकायत दर्ज करने ने इनकार कर दिया कि शरीयत के तहत तलाक-ए-हसन की अनुमति है।
याचिका में यह कहते हुए इस 'प्रथा' को शून्य व असंवैधानिक करार देने की गुहार लगाई गई है कि यह मनमाना व तर्कहीन होने के साथ-साथ मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि कई इस्लामी राष्ट्रों ने इस तरह की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया है लेकिन यह सामान्य रूप से भारतीय समाज में जारी है।