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SC: 'जब अपमानित करने का इरादा हो तभी लगेगा एससी-एसटी कानून', सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर को दी अग्रिम जमानत

Fri, 23 Aug 2024 11:18 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कोर्ट ने स्कारिया की ओर से दाखिल केरल हाईकोर्ट के अग्रिम जमानत देने से इन्कार करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। जिसमें विधायक पीवी श्रीनिजिन की ओर से स्कारिया के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में जमानत नहीं दी गई थी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट कानून के तहत अपराध तभी लागू होगा, जब पूरे समुदाय को अपमानित करने का इरादा हो। यह व्यक्तिगत टिप्पणी पर लागू नहीं होता। मरुनादन मलयाली चैनल चलाने वाले यूट्यूबर शाजन स्कारिया को अग्रिम जमानत देते हुए न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने यह आदेश दिया। 

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कोर्ट ने स्कारिया की ओर से दाखिल केरल हाईकोर्ट के अग्रिम जमानत देने से इन्कार करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। जिसमें विधायक पीवी श्रीनिजिन की ओर से स्कारिया के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले में जमानत नहीं दी गई थी। विधायक श्रीनिजिन ने स्कारिया के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 'मरुनादन मलयाली' पर अपलोड किए गए एक वीडियो के जरिये से झूठे आरोप लगाकर जानबूझकर विधायक को अपमानित किया था। 

शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल इस तथ्य से कि जिस व्यक्ति को अपमानित किया गया या धमकी दी गई, वह व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से है, को अधिनियम की 1989 की धारा 3(1)(आर) के तहत अपराध नहीं माना जाएगा। जब तक आरोपी का इरादा संबंधित व्यक्ति को जाति-आधारित अपमानित करने का न हो।
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पीठ ने कहा कि प्रारंभिक जांच में ऐसा कुछ नहीं दिखा जिससे संकेत मिले कि स्कारिया ने यूट्यूब पर वीडियो जारी करके अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ दुर्भावना की भावनाओं को बढ़ावा दिया या बढ़ावा देने का प्रयास किया। पीठ ने कहा कि वीडियो का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों से कोई लेना-देना नहीं है। उनका निशाना सिर्फ शिकायतकर्ता था। एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध तभी लागू होगा जब कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ समूह के रूप में दुर्भावना या दुश्मनी को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा हो।

पीठ ने कहा कि अदालतों से अपेक्षा की जाती है कि वे यह निर्धारित करने के लिए अपने न्यायिक दिमाग का उपयोग करें कि शिकायत में लगाए गए आरोप, सामान्य रूप से पढ़ने पर, कथित अपराध के तत्वों को संतुष्ट करते हैं या नहीं। न्यायिक दिमाग का ऐसा उपयोग स्वतंत्र होना चाहिए और शिकायत/एफआईआर में उल्लिखित प्रावधानों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। पीठ ने कहा कि अदालतों की भूमिका तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब मामले पर प्रथम दृष्टया निष्कर्ष आरोपी व्यक्ति को अग्रिम जमानत मांगने से रोकता है, जो व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
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