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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: डाकघर धोखाधड़ी के कारण हुए नुकसान के लिए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के हकदार हैं

Mon, 07 Feb 2022 10:18 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक अमूर्त इकाई के रूप में एक डाकघर अपने कर्मचारियों के माध्यम से कार्य करता है। ये कर्मचारी निजी तौर पर बेईमान होने और दूसरों के साथ मिलीभगत से धोखाधड़ी के कार्य करने में सक्षम हैं।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि डाकघर धोखाधड़ी के कारण हुए नुकसाल के लिए अपने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के हकदार हैं। लेकिन, अगर संबंधित कर्मचारी ऐसी हरकतों को अपनी सेवा और कर्तव्यों के दौरान कर रहा था तो इससे डाकघर अपने दायित्व से नहीं मुक्त हो जाता है।

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यह कहते हुए कि एक डाकघर या बैंक को उसके कर्मचारियों द्वारा की गई धोखाधड़ी या गलतियों के लिए उत्तरदाई ठहराया जा सकता है, सु्प्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के मई 2015 के एक फैसले को रद्द कर दिया। 

किसान विकास पत्र (केवीपी) से जुड़े एक मामले में अपने आदेश में एनसीडीआरसी ने उत्तर प्रदेश सर्किल के पोस्ट मास्टर जनरल और कुछ अन्य अधिकारियों के खिलाफ दायर एक शिकायत को खारिज कर दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा: डाकघर धोखाधड़ी के कारण हुए नुकसान के लिए अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के हकदार हैंयह शिकायत 25.54 लाख रुपये की कुछ केवीपी के नकदीकरण से जुड़ी हुई थी। इन केवीपी को उत्तर प्रदेश के विभिन्न डाकघरों से साल 1995 और 1996 में दो व्यक्तियों ने संयुक्त नामों से खरीदा था।

न्यायाधीश एल नागेश्वर राव, संजीव खन्ना और बीआर गवई की पीठ ने निर्देश दिया कि केवीपी को नकदीकरण के लिए डाकघर में प्रस्तुत किए जाने की तिथि के अनुसार केवीपी के परिपक्वता मूल्य का भुगतान करने के लिए अधिकारी संयुक्त रूप से और गंभीर रूप से उत्तरदाई होंगे।

पीठ ने कहा कि फरवरी 2000 में शिकायतकर्ताओं ने लखनऊ के प्रधान डाकघर के पोस्टमास्टर से संपर्क किया था और केवीपी को दूसरे डाकघर में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था। उनका आरोप है कि पोस्टमास्टर ने सिफारिश की थी कि वे उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से नियुक्त और डाकघर से जुड़े एक एजेंट की सेवाएं लें।

शिकायतकर्ताओं ने कहा था कि हमें यह भरोसा करने के लिए गुमराह किया गया था कि एजेंट की मदद के बिना केवीपी को स्थानांतरित करना संभव नहीं होगा। एजेंट उनके आवास पर आया था और उसने हस्ताक्षर किए हुए मूल केवीपी ले लिए थे। जून 2000 में पता चला कि एजेंट ने कई निवेशकों को धोखा दिया था और गिरफ्तार किया जा चुका है।

उन्होंने दावा किया था कि पूछताछ में एक उप पोस्टमास्टर की संलिप्तता सामने आई थी जिसने नियमों का उल्लंघन करते हुए परिपक्वता राशि (25 लाख 54 हजार रुपये) का नकद भुगतान किया था न कि उनके नाम पर चेक से।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एजेंट न तो याचिका का विरोध करने के लिए पेश हुआ है और न ही उसने एनसीडीआरसी के फैसले को चुनौती दी है। उस पर धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात समेत अन्य आरोपों में दोषी ठहराया गया। पीठ ने यह पहलू को देखा कि क्या संबंधित उप पोस्टमास्टर की गलतियों और कृत्यों के लिए विभाग उत्तरदाई होगा।

पीठ ने कहा कि एक अमूर्त इकाई के रूप में एक डाकघर अपने कर्मचारियों के माध्यम से कार्य करता है। ये कर्मचारी निजी तौर पर बेईमान होने और दूसरों के साथ मिलीभगत से धोखाधड़ी के कार्य करने में सक्षम हैं। बैंक या डाकघर के कर्मचारी जब ड्यूटी के दौरान ऐसे कृत्य करते हैं तो इससे अपीलकर्ताओं को नुकसान की भरपाई के लिए कानूनी रूप से आगे बढ़ने का अधिकार मिलता है क्योंकि डाकघर के खिलाफ उनके लिए यही एकमात्र उपाय है।

पीठ ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि उप पोस्टमास्टर ने अपनी नौकरी के दौरान यह धोखाधड़ी की थी। पीठ ने कहा, इन निष्कर्षों को देखते हुए हम अपीलकर्ताओं की ओर से दायर उपभोक्ता मामले को खारिज करते हैं और एनसीडीआरसी के आदेश को रद्द करते हैं।

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