जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ शुक्रवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ महिला संकाय की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय की स्थानीय शिकायत समिति (एलसीसी) के उस फैसले को बहाल करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की है जिसमें कहा गया था कि अपीलकर्ता की शिकायत समय सीमा पार कर चुकी है और खारिज किए जाने योग्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम (पॉश), 2013 के तहत शिकायत अधिकतम छह महीने के भीतर दर्ज कराना अनिवार्य है। शीर्ष न्यायालय ने कोलकाता स्थित पश्चिम बंगाल राष्ट्रीय विधि विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति के खिलाफ एक महिला संकाय की याचिका को समय सीमा समाप्त होने के कारण खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा।
जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ शुक्रवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ महिला संकाय की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा, हमारा मानना है कि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय की स्थानीय शिकायत समिति (एलसीसी) के उस फैसले को बहाल करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं की है जिसमें कहा गया था कि अपीलकर्ता की शिकायत समय सीमा पार कर चुकी है और खारिज किए जाने योग्य है। हालांकि, पीठ ने कहा कि कुलपति के कथित यौन उत्पीड़न के अपराध को माफ किया जा सकता है, लेकिन उनकी करतूत को भुलाया नहीं जा सकता। जस्टिस मिथल ने 15 पृष्ठों के फैसले में लिखा है, गलती करने वाले को माफ करना उचित है, लेकिन गलती को भूलना नहीं चाहिए। अपीलकर्ता के खिलाफ जो गलती हुई है, उसकी तकनीकी आधार पर जांच नहीं की जा सकती लेकिन उसे भूलना नहीं चाहिए। पीठ ने निर्देश दिया कि इस फैसले को कुलपति के बायोडाटा का हिस्सा बनाया जाएगा।
एलसीसी ने अवधि के आधार पर खारिज की थी शिकायत
एलसीसी ने महिला संकाय की शिकायत समय सीमा के कारण खारिज कर दी थी। महिला संकाय के साथ यौन उत्पीड़न की आखिरी कथित घटना अप्रैल 2023 में हुई थी, जबकि उन्होंने 26 दिसंबर, 2023 को शिकायत दर्ज कराई थी। अदालत ने कहा कि यह न केवल तीन महीने की निर्धारित समय सीमा से परे था, बल्कि छह महीने की विस्तार योग्य समय सीमा से भी अधिक था।