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SC: अदालत ने एक महिला को समय से पहले रिहा करने की दी अनुमति, कहा- यह समाज को उपदेश देने वाली संस्था नहीं

Fri, 05 May 2023 04:01 PM IST
देव कश्यप पीटीआई, नई दिल्ली।

सार

शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला का एक पुरुष के साथ प्रेम संबंध था, जो उसे अक्सर धमकी देता था और इस वजह से उसने अपने बच्चों के साथ आत्महत्या करके अपनी जीवन लीला समाप्त करने का निर्णय लिया था।
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला को समय से पहले रिहा करने की अनुमति दी। महिला अपने दो बेटों को जहर देकर मार डालने का दोषी ठहराए जाने के बाद 20 साल जेल की सजा काट ली है। शीर्ष अदालत ने फैसले के दौरान कहा कि वह नैतिकता और नैतिक मूल्यों पर समाज को "उपदेश" देने वाली संस्था नहीं है बल्कि वह कानून के शासन से बंधा है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के अगस्त 2019 के फैसले के खिलाफ महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें उसके दो बेटों की हत्या के लिए उसकी आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया था।

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शीर्ष अदालत ने कहा कि महिला का एक पुरुष के साथ प्रेम संबंध था, जो उसे अक्सर धमकी देता था और इस वजह से उसने अपने बच्चों के साथ आत्महत्या करके अपनी जीवन लीला समाप्त करने का निर्णय लिया था। न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी और  न्यायमूर्ति ए अमानुल्लाह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि महिला ने कीटनाशक खरीदा और इसको अपने दो बच्चों को खिला दिया और जब उसने खुद जहर खाने की कोशिश की तो उसकी भतीजी ने उसे रोक दिया।

पीठ ने गुरुवार को दिए अपने फैसले में कहा, यह अदालत नैतिकता और नैतिक मूल्यों पर समाज को उपदेश देने वाली संस्था नहीं है और हम इस हिसाब से यह नहीं कह रहे हैं, बल्कि हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हम कानून के शासन से बंधे हैं। पीठ ने कहा कि महिला पहले ही लगभग 20 साल जेल में बिता चुकी है। उसने समय से पहले रिहाई के लिए आवेदन किया था, लेकिन राज्य स्तरीय समिति (एसएलसी) की सिफारिश को सितंबर 2019 में तमिलनाडु सरकार ने उसके द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति को देखते हुए खारिज कर दिया था। 
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हत्या के अपराध के लिए उसकी सजा में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि कि समय से पहले उसकी रिहाई के लिए एसएलसी की सिफारिश को स्वीकार न करने का राज्य सरकार के पास कोई वैध कारण या उचित आधार नहीं था। न्यायालय ने समय-पूर्व रिहाई की सिफारिश को खारिज करने के राज्य के फैसले को दरकिनार करते हुए कहा, हम अपराध से अनजान नहीं हैं, लेकिन हम इस तथ्य से भी अनजान नहीं हैं कि अपीलकर्ता (मां) पहले ही किस्मत के क्रूर थपेड़ों का सामना कर चुकी है।

पीठ ने यह कहते हुए कि महिला समय से पहले रिहाई के लाभ की हकदार है, निर्देश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में इसकी आवश्यकता नहीं है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। अदालत ने उल्लेख किया कि निचली अदालत ने जनवरी 2005 में महिला को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दोषी ठहराया था और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में, हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में उसकी सजा को बरकरार रखते हुए आईपीसी की धारा 309 के तहत अपराध के मामले में उसे बरी करके उसकी अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया था।

शीर्ष अदालत ने कहा, मामले पर विस्तार से विचार करने के बाद इस अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता ने जिन परिस्थितियों में अपने दो बेटों को जहर दिया, उससे स्पष्ट रूप से पता चलता है कि वह अत्यंत मानसिक तनाव की स्थिति में थी। समय-पूर्व रिहाई के मुद्दे से निपटते हुए पीठ ने उल्लेख किया कि समय से पहले महिला को रिहा किए जाने की एसएलसी की सकारात्मक सिफारिश को राज्य ने इस आधार पर खारिज कर दिया कि उसने अपने अवैध संबंधों को निर्बाध जारी रखने के लिए अपने बेटों को जहर देकर मार डाला।

पीठ ने कहा, अदालत उल्लेख करना चाहेगी कि अपीलकर्ता ने अपने अवैध संबंधों को जारी रखने के उद्देश्य से कभी भी अपने बेटों की हत्या करने की कोशिश नहीं की। इसके विपरीत, उसने अपने प्रेमी की तरफ से उत्पन्न की गई स्थिति के चलते अपने बच्चों के साथ खुद आत्महत्या करने की कोशिश की थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसे ‘‘क्रूर और बर्बर’’ अपराध के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता क्योंकि महिला ने खुद का जीवन भी समाप्त करने की कोशिश की थी, लेकिन उसकी भतीजी ने समय रहते उसे रोक दिया।

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