सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि हर आपराधिक न्यायशास्त्र का लक्ष्य अपराधी के चरित्र को सुधारना और पीड़ित की देखभाल करना है। शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी अपनी पत्नी पर अत्याचार करने के आरोपी व्यक्ति की सजा को घटाकर अब तक काटी जा चुकी कैद के बराबर करते हुए की। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बदले में आरोपी को अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को तीन लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हृषिकेश राय की पीठ ने कहा कि आरोपी द्वारा काटी गई जेल की अवधि को सजा की अवधि के रूप में माना जाएगा, बशर्ते कि वह तीन लाख रुपये की मुआवजा राशि अगले साल फरवरी के अंत से पहले ट्रायल कोर्ट के समक्ष या जमा करा दे।
आरोपी को उसकी पहली पत्नी की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया था और बाद में ट्रायल कोर्ट ने जनवरी 2014 में तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इसे झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उसकी अपील पिछले साल अक्तूबर में खारिज हो गई। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ उसने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई थी। शीर्ष अदालत की पीठ ने इस बात पर गौर किया कि आरोपी सात महीने जेल में काट चुका है और अपनी पत्नी व दो बच्चों के लिए तीन लाख रुपये का मुआवजा देने को तैयार है। शीर्ष अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस अधिकारियों को पीड़ित महिला भी मुआवजा लेने की सहमति दे चुकी है।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर पीठ ने अपने निर्णय में कहा, किसी भी आपराधिक न्यायशास्त्र का उद्देश्य अपराधी के चरित्र को सुधारना और पीड़ित की देखभाल करना है। इसके लिए ही विधान में आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 अधिनियमित की गई है, जिसका उद्देश्य अपराध के कारण हुए नुकसान या चोट के लिए मुआवजे के भुगतान की रिकवरी करना है। पीठ ने कहा, मौजूदा मामले में इस राशि की स्वेच्छा से पेशकश की जा रही है, हालांकि यह पेशकश सजा में कमी की मांग करने के लिए है।