सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालत से सेवा बहाली मिलने के बाद कोई बर्खास्त कर्मचारी अधिकार के तहत वेतन पर दावा नहीं कर सकता है। अपने वेतन का दावा केवल तभी कर सकता है, जब वह यह साबित कर दे कि बर्खास्तगी के दौरान कहीं सवेतन कार्यरत नहीं था।
जस्टिस एएम सप्रे और एसए नजीर की पीठ ने कहा कि इसके साथ ही कंपनी को भी यह साबित करना होगा कि बर्खास्तगी के दौरान कर्मचारी कहीं सवेतन कार्यरत नहीं था, इसलिए वह उस दौरान के वेतन का दावा नहीं कर सकता है। हालांकि कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि इसे साबित करना की शुरुआती जिम्मेदारी कर्मचारी पर होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दो मामलों के संबंध में दिया है। एक मामला राजस्थान राज्य सड़क परिवहन कॉरपोरेशन के ड्राइवर फूल चंद का था। लगातार अनुपस्थित रहने के आधार पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया था। वहीं दूसरे मामले में राजस्थान के सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं इंजीनियरिंग विभाग से 37 कर्मियों को निकाल दिया गया था। इन कर्मचारियों ने पहले लेबर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
लेबर कोर्ट ने उनकी बर्खास्तगी खारिज कर दी और विभागों को आदेश दिया कि वे उनका पूरा वेतन वापस दें। इसके बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने भी लेबर कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ मामलों में अदालत पूरा वेतन देने से मना कर सकती है जबकि कुछ अन्य मामलों में तथ्यों और सुबूतों के आधार पर न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते हुए वेतन का कुछ हिस्सा देने का आदेश दे सकती हैं।