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Supreme Court: प्रशासनिक कामकाज में हर स्तर पर महिलाओं के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार

Sun, 06 Oct 2024 03:56 AM IST
राहुल कुमार राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा, यह परिदृश्य तब और भी गंभीर हो जाता है जब हम एक देश के रूप में सार्वजनिक कार्यालयों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से निर्वाचित निकायों में पर्याप्त महिला प्रतिनिधियों समेत सभी क्षेत्रों में लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण के प्रगतिशील लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह बेहद चिंताजनक है कि पंचायत में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को सरकारी अथॉरिटी के लापरवाह रवैये से हटा दिया जाता है। यह प्रशासनिक कामकाज के सभी स्तरों पर व्याप्त पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार के प्रणालीगत स्वरूप को दर्शाता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रशासनिक कामकाज के सभी स्तरों पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का एक व्यवस्थित पैटर्न है।

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जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा, यह परिदृश्य तब और भी गंभीर हो जाता है जब हम एक देश के रूप में सार्वजनिक कार्यालयों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से निर्वाचित निकायों में पर्याप्त महिला प्रतिनिधियों समेत सभी क्षेत्रों में लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण के प्रगतिशील लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। नासिक में एक महिला सरपंच की अयोग्यता को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, निर्वाचित जनप्रतिनिधि को हटाने के मामले को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए, खासकर जब यह ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं से जुड़ा हो। पीठ ने कहा, यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि ये महिलाएं जो ऐसे सार्वजनिक पदों पर कब्जा करने में सफल होती हैं, वे काफी संघर्ष के बाद ही ऐसा करती हैं।

क्या है मामला
फरवरी, 2021 में सरपंच के रूप में निर्वाचित अपीलकर्ता मनीषा रवींद्र पानपाटिल को जिला कलेक्टर ने इस आरोप पर अयोग्य घोषित कर दिया था कि वह अपनी सास के साथ सरकारी जमीन पर बने घर में रह रही थी। मंडलायुक्त ने आदेश को बरकरार रखा और हाईकोर्ट ने भी उसकी याचिका खारिज कर दी। महिला ने उस विशेष आवास में रहने से इन्कार किया और दावा किया कि वह अपने पति और बच्चों के साथ किराये के मकान में अलग रहती है। उसने कहा कि संबंधित आवास इतनी जर्जर स्थिति में था कि उसमें रहना संभव नहीं था। पीठ ने उसे हटाए जाने को अत्यधिक असंगत मानते हुए कहा कि तथ्य-खोज अभ्यास करने की दिशा में कोई प्रयास किए बिना ही आदेश को लापरवाही से पारित किया गया।
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सरकारी महकमे ने निर्वाचित प्रतिनिधि को हटाने में लापरवाही बरती :
पीठ ने कहा, हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि निजी व्यक्तियों (प्रतिवादियों) ने भेदभावपूर्ण तरीके से काम किया होगा लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि सरकारी अथॉरिटी ने एक निर्वाचित प्रतिनिधि को हटाने में लापरवाही बरती। यह तब और भी अधिक चिंताजनक हो जाता है जब संबंधित प्रतिनिधि एक महिला है और आरक्षण कोटे में चुनी गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासनिक कामकाज के सभी स्तरों पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार का एक व्यवस्थित पैटर्न व्याप्त है।
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गांव वाले इसे स्वीकार नहीं कर पाए कि महिला सरपंच बनी :

पीठ ने कहा कि यह सटीक मामला है, जहां गांव वाले यह स्वीकार नहीं कर पाए कि अपीलकर्ता, एक महिला होने के बावजूद, सरपंच बन गई।

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