देश में अगर खाने-पीने वाली वस्तुओं की महंगाई बढ़ती है तो इसका प्रमुख कारण बिचौलियों की भारी-भरकम कमाई है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की रिपोर्ट कहती है कि जो वस्तुएं जल्दी खराब होती हैं, उनमें उत्पादकों को खुदरा कीमत का केवल 30 फीसदी ही हिस्सा मिल पाता है। जो वस्तुएं लंबे समय तक चलती हैं, उनमें व्यापारी को 70 फीसदी तक हिस्सा मिल जाता है।
आरबीआई की शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि केले को जलगांव से दिल्ली पहुंचने में कुल खुदरा कीमत का 30 फीसदी हिस्सा किसान को मिलता है। 19.2 फीसदी हिस्सा थोक व्यापारी लेता है। 26.9 फीसदी ट्रेडर व 23 फीसदी खुदरा कारोबार लेता है। ऐसे में यदि केला 50 रुपये दर्जन बिके तो किसान को महज 15 रुपये ही मिल पाएंगे इसी तरह, आम पर किसान को 43 फीसदी रकम मिलती है। ट्रेडर्स 10 फीसदी लेता है तो परिवहन की लागत 5 फीसदी होती है। मजदूर की लागत दो फीसदी और थोक व्यापारी का कमीशन 7 फीसदी होता है। हालांकि, 8 फीसदी रकम फल के नुकसान में चली जाती है। खुदरा व्यापारी का मार्जिन 27 फीसदी होता है। इसका मतलब आपको आम 155 रुपये किलो मिल रहा है तो मूल किसान को केवल 67 रुपये ही मिल पा रहा है। ब्यूरो
दूध में किसान को 71 फीसदी कमाई
दूध को स्टोर करके लंबे समय तक रखा जा सकता है। इसलिए इसमें किसान को 71 फीसदी तक रकम मिल जाती है। खुदरा कारोबारी सात फीसदी कमीशन लेता है। 13 फीसदी इसके रख-रखाव पर खर्च होता है। बाकी अन्य खर्च होते हैं। कुल दूध उत्पादन में गांवों में 42 फीसदी खपत होती है।
मुर्गी में 55.5% और अंडे में 69%
मुर्गी पालन में मालिक को कुल कीमत की 55-56 फीसदी रकम मिलती है। थोक व्यापारी 8.33 फीसदी, खुदरा व्यापारी 19.17 फीसदी और ट्रेडर्स 11 फीसदी कमीशन लेता है। तीन फीसदी हिस्सा नुकसान हो जाता है। इसी तरह अंडे में मालिक को 69 फीसदी रकम मिलती है। ट्रेडर्स को 10 फीसदी, थोक कारोबारी को सात फीसदी और खुदरा व्यापारी को 10 फीसदी कमीशन मिलता है।
दालों पर 75 फीसदी तक मुनाफा
दालों में किसानों को 75 फीसदी तक रकम मिल रही है। तीन फीसदी बाजार शुल्क, तीन फीसदी मंडी के मजदूर का और पैकिंग शुल्क, तीन फीसदी नुकसान व 8 फीसदी खुदरा कारोबारी का शुल्क है। अरहर दाल में 65 फीसदी किसान को मिल रहा है। 14 फीसदी खुदरा कारोबारी का शुल्क है। इसी तरह मूंग दाल में किसान को 70 फीसदी मिल रहा है।
आपूर्ति घटने व तनाव बढ़ने से महंगाई पर असर : आरबीआई ने कहा, 2020 के बाद कई देशों के बीच तनाव और विपरीत जलवायु घटनाओं के कारण आपूर्ति में व्यवधान से खाद्य महंगाई तेजी से बढ़ गई। मार्च-अक्तूबर, 2022 के बीच औसतन 7.6 फीसदी और जुलाई-दिसंबर 2023 के दौरान 8.2 फीसदी महंगाई रही। महंगाई का असर तत्काल दिखता है।
सब्सिडी बिल और कृषि कर्ज माफी से बढ़ा राजकोषीय घाटा : रिपोर्ट के अनुसार, सब्सिडी बिल और कृषि ऋण माफी से राजकोषीय घाटे में वृद्धि हुई। इसने 2008-09 के संकट के दौरान खाद्य महंगाई को बढ़ाने में योगदान दिया, जबकि प्रमुख निर्यातक अर्थव्यवस्थाओं में उनकी खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिबंधात्मक व्यापार नीतियों ने भी भूमिका निभाई।