किसी भी शिकायत के संदर्भ में अदालत द्वारा प्रारंभिक जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत किसी शिकायत पर प्रारंभिक जांच करने के लिए बाध्य नहीं है। इसके बाद भी अगर अदालत ऐसा करने का फैसला करती है तो उसे उन तथ्यों का अंतिम सेट तैयार करना चाहिए जो उस मामले में ठीक हों। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि न्याय के हित में अपराध की जांच की जानी चाहिए।
जस्टिस संजय किशन कौल, अभय एस ओका और विक्रम नाथ की पीठ ने ये बातें 2020 में शीर्ष अदालत की दो-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा किए गए एक संदर्भ से उत्पन्न मामले में जवाब देते हुए कहीं। पीठ ने कहा कि 2003 में प्रीतीश बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य में भी इसे ही ध्यान में रखा गया था और 2005 में इकबाल सिंह मारवाह बनाम मीनाक्षी में पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने भी फैसले में इसी विचार को ध्यान में रखा था।
26 फरवरी, 2020 के आदेश के तहत दो सवालों के जवाब मांगने वाले एक संदर्भ से उत्पन्न मामले को न्यायमूर्ति कौल की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष रखा गया था। आदेश में संदर्भित पहला प्रश्न था कि 'क्या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 340 में प्रारंभिक जांच अनिवार्य है और किसी न्यायालय द्वारा संहिता की धारा 195 के तहत शिकायत किए जाने से पहले संभावित आरोपी को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाता है?' इसके अलावा दूसरा प्रश्न था कि 'इस तरह की प्रारंभिक जांच का दायरा और दायरा क्या है?'
दो-न्यायाधीशों की पीठ ने 26 फरवरी, 2020 के अपने आदेश में जालसाजी से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए नोट किया कि 2003 में प्रीतीश बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य और 2005 में इकबाल सिंह मारवाह बनाम मीनाक्षी मारवाह के मामले में फैसला सुनाया गया था। उसमें संविधान पीठ ने कहा कि अदालत प्रारंभिक जांच करने के लिए बाध्य नहीं है और आरोपी को सुनवाई का मौका दिया जाए।
इसके अलावा दो-न्यायाधीशों की पीठ ने अपने आदेश में यह भी नोट किया था कि 2010 में शरद पवार बनाम जगमोहन डालमिया और अन्य के मामले में तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने वकीलों की दलीलों को ध्यान में रखते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 340 के तहत विचार के अनुसार प्रारंभिक जांच करना आवश्यक था।
दो न्यायाधीशों की पीठ ने अपने संदर्भ आदेश में कहा कि 2010 के मामले (शरद पवार मामले) में लिया गया यह विचार प्रीतिश के मामले और इकबाल सिंह मारवाह मामले में विचार के विपरीत था।
पीठ ने अपने 15 सितंबर के आदेश में कहा कि मामले को ध्यान से देखने पर यह हमारा विचार है कि संविधान पीठ का विचार स्वाभाविक रूप से मान्य होगा जो कानूनी स्थिति को काफी स्पष्ट करता है। इतना ही नहीं, अगर हम ध्यान दें, तो शरद पवार के मामले में जो रिपोर्ट किया गया है वह केवल एक आदेश है ना कि निर्णय। आदेश दिए गए तथ्यात्मक परिदृश्य में है। वहीं, निर्णय कानून के सिद्धांतों को निर्धारित करता है।