भरी पंचायत में थप्पड़ खाने के छह महीने बाद आत्महत्या करने की घटना को सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध मानने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा है कि किसी व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए उकसाने का तभी दोषी माना जा सकता है जब उसने उकसाने में नजदीकी तौर पर सक्रिय भूमिका निभाई हो और उसका कृत्य और खुदकुशी की घटना का अंतराल कम हो।
न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति एमआर शाह की पीठ ने कहा है कि कोई भी मामला धारा-306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के परिधि में तभी आ सकता है जो आत्महत्या की घटना हुई हो और आत्महत्या के लिए उकसाने वाले व्यक्ति की भूमिका सक्रिय हो और उसकेकृत्या और खुदकुशी की घटना का अंतराल कम हो।
अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को महज इसलिए दोषी ठहराया नहीं ठहराया जा सकता कि उस पर प्रताड़ित करने का आरोप लगा हो। इसके लिए जरूरी है कि उसका ऐसा कृत्य हो जिसकी वजह से किसी व्यक्ति को खुदकुशी करने के लिए बाध्य होना पड़ा और वह भी दोनों वाक्ये का अंतराल कम हो।
शीर्ष अदालत ने धारा-306 की इस तरह व्याख्या करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया है जिसमें एक व्यक्ति को अपने बहनोई को खुदकुशी के लिए उकसाने का दोषी मानते हुए पांच वर्ष कैद की सजा सुनाई गई थी।
मामले के मुताबिक, वादी राजेश की बहन मंजू की शादी अरविन्द नामक व्यक्ति से सात नवंबर, 2000 को हुई थी। राजेश पर आरोप था कि वह अरविंद और उसके परिवार वालों को दहेज के झूठे मामले में फंसाने की धमकी देता था। इसे लेकर सितंबर, 2001 को पंचायत भी बैठी थी, जहां राजेश ने अरविन्द को थप्पड़ जड़ दिया। इसके बाद 23 फरवरी 2002 को अरविन्द ने सल्फास की गोली खाकर खुदकुशी कर ली।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में साक्ष्यों पर गौर करने के बाद पाया कि पंचायत और खुदकुशी की घटना के बीच छह महीने का अंतराल था। महज थप्पड़ मारने की घटना को खुदकुशी के लिए उकसाने का एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता।