सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अगर कोई क्षेत्र पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र में आता है तो न केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार को वहां खनन की इजाजत है।
कोर्ट ने यह टिप्पणी झारखंड सरकार द्वारा उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की जिसमें केंद्र सरकार द्वारा व्यवसायिक खनन की नीलामी करने का निर्णय लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रथमदृष्टया केंद्र सरकार, राज्यों के कोयला खदानों की नीलामी करने का अधिकार रखता है।
चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार को एक हफ्ते के अंदर हलफनामा दाखिल कर यह बताने के लिए कहा है कि वह क्षेत्र, पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र है या नहीं?
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि फिलहाल वह यह तय नहीं कर रही हैं कि केंद्र सरकार को खनन का अधिकार है या झारखंड सरकार को। पीठ ने कहा कि हम विशेषज्ञ नहीं है। वह क्षेत्र इको सेंसिटिव है या नहीं, हम इसका पता लगाने के लिए विशेषज्ञ को भेज सकते हैं।
सुनवाई के दौरान झारखंड सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन ने कहा कि कोयला खदानों की नीलामी को कुछ महीनों के लिए टाला जा सकता है। वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश दूसरे वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजातियों की आबादी है। वहां 30 फीसदी वन क्षेत्र है और ये पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के तहत आते हैं।
उन्होंने कहा कि हम खदानों की नीलामी को इसलिए चुनौती दे रहे हैं क्योंकि यह व्यापक जनहित में नहीं है और साथ ही यह एमएमडीआर एक्ट के विरुद्ध है। केंद्र सरकार ने 18 जून को 41 कोयला ब्लॉक की वर्चुअल नीलामी का निर्णय लिया था।
झारखंड सरकार ने वाणिज्यिक खनन के लिए केंद्र की महत्वाकांक्षी परियोजना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्रीय कोयला मंत्रालय द्वारा कोयला खदानों की प्रस्तावित नीलामी पर फिलहाल रोक लगाने की मांग की है।