वसीयत और जमीन धोखाधड़ी से जुडे मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। इसके तहत कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में 20 साल पुराने फर्जी वसीयत और जमीन धोखाधड़ी मामले में एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को खत्म कर दिया है।
यह मामला तमिलनाडु के करूर जिले से जुड़ा है। यह केस 2004 की एफआईआर से शुरू हुआ था, जिसमें आरोप था कि एक वसीयत को फर्जी तरीके से तैयार कर जमीन बेची गई और असली उत्तराधिकारियों को उनके हक से वंचित किया गया। इस मामले में कई लोगों के साथ-साथ जमीन खरीदने वाले भी आरोपी बनाए गए थे।
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कोर्ट ने किस बात को नहीं माना अपराध
मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे, ने कहा कि सिर्फ किसी विवादित संपत्ति को पैसे देकर खरीद लेना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि खरीदार ने धोखाधड़ी या साजिश में हिस्सा लिया हो। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि खरीदार ने फर्जी वसीयत बनाने में कोई भूमिका निभाई थी या उसे इसकी जानकारी थी। इसलिए उसके खिलाफ आपराधिक केस जारी रखना गलत होगा।
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नुकसान खरीदार को होता है- कोर्ट
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति मालिक होने का दावा करके संपत्ति बेचता है, तो आमतौर पर नुकसान खरीदार को होता है, न कि तीसरे पक्ष को जब तक कि धोखाधड़ी में उसकी सीधी भूमिका साबित न हो। कोर्ट ने यह मानते हुए कि इस खरीदार के खिलाफ केस चलाना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, उसके खिलाफ सभी आपराधिक कार्यवाही खत्म कर दी। हालांकि, बाकी आरोपियों के खिलाफ केस चलता रहेगा।