सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब गवाह एक-दूसरे से संबंधित या पक्षपाती हो तो उनकी गवाही का परीक्षण की अधिक सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने हत्या के एक मामले में आरोपियों को बरी करते हुए यह टिप्पणी की। जब्बार अली और अन्य को निचली अदालत ने हत्या में दोषी ठहराया था और गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी थी।
शीर्ष अदालत के समक्ष अपीलकर्ताओं ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष वर्तमान मामले में किसी भी स्वतंत्र गवाह की जांच करने में विफल रहा। गवाह एक-दूसरे से संबंधित थे और सभी गवाहों ने विरोधाभासी बयान दिए हैं कि मृतक पर घातक हमला किसने किया। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की सराहना करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अभियोजन पक्ष ने केवल संबंधित गवाहों से पूछताछ की है। उसने एक भी स्वतंत्र गवाह से पूछताछ नहीं की।
गंगाधर बेहरा और अन्य बनाम उड़ीसा के मामले में शीर्ष अदालत ने माना है कि ऐसे संबंधित गवाहों की गवाही का विश्लेषण सावधानी से किया जाना चाहिए। अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में विरोधाभासों के कारण अभियोजन पक्ष के साक्ष्य को पूरी तरह से अविश्वसनीय माना जाता है। इसके अलावा एक भी स्वतंत्र गवाह नहीं है। तथ्य और परिस्थितियां को देखते हुए अपीलकर्ताओं के खिलाफ कथित अपराध साबित नहीं होते हैं।
परंपरागत तरीके से कम नहीं होगा न्यायालय का ‘बोझ’
सुप्रीम कोर्ट ने सांविधानिक अदालतों में लंबित आपराधिक मुकदमों पर चिंता जताते हुए कहा, न्यायपालिका का बोझ कम करने के लिए पारंपरिक तरीके पर्याप्त नहीं होंगे। दरअसल, शीर्ष अदालत ने पाया कि सांविधानिक अदालतों में दाखिल होने वाले मामलों में 80% से अधिक आपराधिक मामले हैं। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कहा, इस संबंध में तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। पीठ ने ये टिप्पणियां तब की जब वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने बताया कि पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए एकता कपूर की याचिका को सूचीबद्ध करना बहुत मुश्किल था।
रोहतगी ने कहा, हाईकोर्ट जमानत आवेदनों और आपराधिक अपीलों से भरा हुआ है। जस्टिस रस्तोगी ने कहा, विशेष रूप से पटना हाईकोर्ट में फाइलिंग ऐसी है जो असहनीय है। 80-85 प्रतिशत आपराधिक फाइलिंग है। भगवान ही जानता है कि वे कैसे प्रबंधन करेंगे?
जस्टिस रस्तोगी ने जब कहा कि बॉम्बे और इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थिति समान है तो रोहतगी ने बताया कि कम से कम बॉम्बे हाईकोर्ट में मामलों को तत्काल सूचीबद्ध करने के लिए उल्लेख की एक प्रक्रिया है, जो इलाहाबाद और पटना हाईकोर्ट में नहीं है। पीठ ने कहा, मामलों के प्रबंधन के लिए तत्काल कुछ करना होगा। पीठ ने यह भी बताया कि हर राज्य में धारा-482 के तहत एफआईआर रद्द करने, चार्जशीट रद्द करने और संज्ञान लेने के लिए कई याचिकाएं दायर की जा रही हैं।
पीठ ने कहा, हम हाईकोर्ट पर दबाव भी बना रहे हैं कि कारण बताएं! रोहतगी ने कहा, यह दोनों तरह से काम करता है। यदि एक विस्तृत आदेश पारित किया जाता है तो कहा जाता हैं कि वे एक मिनी ट्रायल कर रहे हैं, यदि यह एक पृष्ठ का आदेश है तो कहा जाता है कि कोई कारण नहीं है।
रोहतगी ने सुझाव दिया कि न्यायालय आपराधिक मामलों से निपटने के लिए हाईकोर्ट और निचली अदालतों के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करे। सुप्रीम कोर्ट के अनुभवी वकीलों और न्यायाधीशों के बीच कुछ विचार-मंथन सत्र आयोजित किया जाना चाहिए। इस पर जस्टिस रस्तोगी ने कहा, निचली अदालत के जज जमानत देने से पूरी तरह अलग हो रहे हैं।
ट्रायल कोर्ट के जज मौजूदा माहौल में जमानत देने के लिए अपने विवेक का प्रयोग करने से डरते हैं क्योंकि वे जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। इसलिए जमानत याचिका खारिज करने का सबसे सुरक्षित तरीका अपनाते हैं। इस कारण वादी हाईकोर्ट का रुख करते हैं। अंततः रोहतगी ने एकता कपूर की याचिका वापस ले ली।