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Minority Status: हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मांगे सुबूत, देवकीनंदन ने दायर की है याचिका

Tue, 19 Jul 2022 02:15 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।

सार

देवकीनंदन ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका के जरिये केंद्र सरकार की 1993 की अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक घोषित किया गया था।
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सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : PTI
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विस्तार
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देश के कुछ राज्यों में हिंदुओं की संख्या कम होने के बावजूद उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा न देने की देवकीनंदन ठाकुर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, इस संबंध में पुख्ता प्रमाण पेश किया जाए। तभी हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग वाली याचिका पर विचार कर सकता है। इस मामले दो हफ्ते बाद अगली सुनवाई होगी।

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जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने मौखिक रूप से कहा, अगर कोई ठोस मामला है कि मिजोरम या कश्मीर में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने से इनकार किया जाता है तो हम विचार कर सकते हैं। जब तक हमें कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, हम इससे निपट नहीं सकते। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अरविंद दातार ने कहा कि ये मामला पहले भी कोर्ट से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को भेजा चुका है। कोर्ट ने अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

दरअसल, देवकीनंदन ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका के जरिये केंद्र सरकार की 1993 की अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन को राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक घोषित किया गया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि लद्दाख में एक फीसदी, मिजोरम में 2.75 फीसदी, लक्षद्वीप में 2.77, कश्मीर में चार, नगालैंड में 8.74, मेघालय में 11.52, अरुणाचल प्रदेश में 29 और पंजाब में 38.49 फीसदी हिंदू हैं। लेकिन केंद्र ने उसे ‘अल्पसंख्यक’ घोषित नहीं किया है। दूसरी ओर केंद्र ने मुसलमानों को अल्पसंख्यक घोषित किया है जो लक्षद्वीप में 96.58, कश्मीर में 95, लद्दाख में 46 फीसदी हैं। इसी तरह केंद्र ने ईसाइयों को अल्पसंख्यक घोषित किया है जो नागालैंड में 88.10 फीसदी, मिजोरम में 87.16 फीसदी और मेघालय में 74.59 फीसदी हैं।
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अल्पसंख्यकों को राज्यवार परिभाषित किया जाना चाहिए
पीठ ने दातार से पूछा कि क्या किसी समुदाय को धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अधिकारों का उपयोग करने के लिए अल्पसंख्यक का दर्जा देने वाली अधिसूचना आवश्यक है। जवाब में दातार ने कहा कि अधिसूचना के बिना, अनुच्छेद 29 और 30 के तहत अधिकारों का उपयोग नहीं किया जा सकता। जस्टिस भट ने कहा, भाषाई अल्पसंख्यकों को देखें। महाराष्ट्र में एक कन्नड़ भाषी व्यक्ति अल्पसंख्यक है। क्या किसी अधिसूचना की आवश्यकता है? कोर्ट ने कहा कि मिसाल के तौर पर अल्पसंख्यकों को राज्यवार परिभाषित किया जाना चाहिए।

हिंदू अल्पसंख्यक नहीं हो सकते, यह आम धारणा 
दातार ने कहा, हम हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा से वंचित करने की बात कर रहे हैं। एक आम धारणा है कि हिंदू अल्पसंख्यक नहीं हो सकते। इस पर जस्टिस ललित ने कहा, क्या आपको किसी राज्य में अल्पसंख्यक का दर्जा देने से इनकार किया गया है? अब तक हम इस पर हवा में विचार कर रहे हैं। जस्टिस ललित ने कहा, क्या आप अल्पसंख्यक के रूप में किसी विशेष संस्थान की अधिसूचना को चुनौती दे रहे हैं? क्या कानून को चुनौती दी गई है? क्या आप इससे प्रभावित हैं? वास्तव में आप किस स्टेटस का दावा कर रहे हैं? हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि याचिकाकर्ता किस का दावा कर रहा है ?

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