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Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दिव्यांगता से सहानुभूति एक पहलू पर तैनाती में व्यावहारिकता जरूरी

Thu, 03 Nov 2022 06:53 AM IST
वीरेंद्र शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पीठ ने एक घटना का जिक्र किया, जिसमें चेन्नई में शत प्रतिशत दृष्टिहीनता वाले व्यक्ति को सिविल जज जूनियर डिवीजन के रूप में नियुक्त किया गया था और अदालत के अनुवादकों ने उनके हस्ताक्षरित सभी आदेश प्राप्त किए।
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supreme court, सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ani
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बात की जांच करने को कहा कि कैसे दिव्यांग लोगों को सिविल सेवाओं में विभिन्न श्रेणियों में रखा जा सकता है। जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा, दिव्यांगता के प्रति सहानुभूति एक पहलू है, लेकिन फैसले की व्यावहारिकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। 
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पीठ ने एक घटना का जिक्र किया, जिसमें चेन्नई में शत प्रतिशत दृष्टिहीनता वाले व्यक्ति को सिविल जज जूनियर डिवीजन के रूप में नियुक्त किया गया था और अदालत के अनुवादकों ने उनके हस्ताक्षरित सभी आदेश प्राप्त किए। बाद में उन्होंने एक तमिल पत्रिका के संपादक के रूप में काम किया। पीठ ने कहा कि कृपया आप समीक्षा कीजिए। वे सभी श्रेणियों में फिट नहीं बैठते हैं। सहानुभूति एक पहलू है, लेकिन व्यावहारिकता भी एक अन्य पहलू है। 

केंद्र ने मांगा और समय
इससे पहले अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने केंद्र की ओर से दलील दी कि सरकार मामले में विचार कर रही है। उन्होंने और समय की मांग की। पीठ ने कहा कि वह आठ हफ्ते बाद मामले में सुनवाई करेगी। पीठ ने 25 मार्च को दिव्यांगों को भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस), दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह पुलिस सेवा (डैनिप्स) और भारतीय रेलवे सुरक्षा बल सेवा (आईआरपीएफएस) में अपनी प्राथमिकता के अनुसार आवेदन करने को कहा था और इस संबंध में यूपीएससी को आवेदन फॉर्म जमा करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की 18 अगस्त, 2021 की अधिसूचना को चुनौती देने वाली ‘दिव्यांगों के अधिकारों के लिए राष्ट्रीय मंच’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश पारित किया था। एजेंसी
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लड़कियों को मुफ्त मिले सैनिटरी पैड... सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार व राज्यों को छठी से 12वीं कक्षा तक पढ़ने वाली लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड मुहैया कराने की मांग की गई है। इसमें साथ ही सभी सरकारी सहायता प्राप्त और आवासीय स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय मुहैया कराने की भी मांग की गई है।
याचिकाकर्ता जया ठाकुर के अनुसार, गरीब पृष्ठभूमि से आने वाली 11 से 16 साल की उम्र की महिलाओं की अक्सर हाइजीनिक तरीकों तक पहुंच नहीं हैं। याचिका में कहा गया है कि सरकार द्वारा कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन वे पूरे देश में सभी लड़कियों को कवर करने में सक्षम नहीं हैं। वाटर एड में छपी रिपोर्ट के अनुसार, पानी की कमी, बुनियादी स्वच्छता और हाइजीन से संबंधित बीमारियां एक वर्ष में दुनिया भर में लगभग आठ लाख महिलाओं की मृत्यु के लिए जिम्मेदार है। साथ ही बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने में एक बड़ी बाधा बन रही है। एजेंसी
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