फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: कर्ज वापस मांगना खुदकुशी के लिए उकसाना नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

Fri, 20 Mar 2026 07:22 PM IST
राकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

यह मामला गुजरात के मोरबी जिले का है, जहां एक व्यक्ति ने ट्रैक्टर-ट्रॉली के नीचे कूदकर अपनी जान दे दी थी। मरने से पहले उसने एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें उसने नौ लेनदारों के नाम लिखे थे।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Supreme Court On Loan Repayment: देश के शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी कर्ज लेने वाले से अपने पैसे वापस मांगना अपराध की श्रेणी में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि कर्ज की वसूली के लिए दबाव बनाना या बार-बार फोन करना 'आत्महत्या के लिए उकसाने' का आधार नहीं हो सकता।
विज्ञापन


क्या है पूरा मामला?
यह मामला गुजरात के मोरबी जिले का है, जहां एक व्यक्ति ने ट्रैक्टर-ट्रॉली के नीचे कूदकर अपनी जान दे दी थी। मरने से पहले उसने एक सुसाइड नोट छोड़ा था, जिसमें उसने नौ लेनदारों के नाम लिखे थे। उसका आरोप था कि ये लोग बकाया पैसे के लिए उसे परेशान और धमका रहे हैं। इसी सुसाइड नोट के आधार पर धीरभाई नांजीभाई पटेल लोटवाला और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले में एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

यह भी पढ़ें: वर्सोवा-भायंदर रोड के लिए मैंग्रोव हटाने पर रोक से 'सुप्रीम' इनकार, कहा- जनता को होगा बड़ा फायदा
विज्ञापन


सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को पलटा
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने गुजरात हाई कोर्ट के आदेश को पलटते हुए कहा कि केवल सुसाइड नोट में नाम होने से कोई दोषी नहीं हो जाता। अदालत ने कहा कि इसमें किसी भी आरोपी की विशिष्ट भूमिका का जिक्र नहीं था। मृतक ने सभी नौ लेनदारों को 'एक ही चश्मे' से देखा और उन पर सामान्य आरोप लगाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कॉल रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपी ने 6 महीने में करीब 40 बार फोन किया था। लेकिन अदालत के अनुसार, "अगर कोई लेनदार अपने पैसे वापस पाने के लिए फोन करता है, तो यह एक वैध कार्य है। इसे अपने आप में आपराधिक नहीं माना जा सकता।"
विज्ञापन


कानून का दुरुपयोग रोकना जरूरी
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में मुकदमा चलाना 'कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग' है। जब तक यह साबित न हो कि आरोपी ने मृतक को शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया था या उसे आत्महत्या के लिए सीधे तौर पर मजबूर किया था, तब तक इसे उकसाना नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने माना कि बिना ठोस सबूतों के ट्रायल चलाना समय की बर्बादी होगी, इसलिए आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया।



 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें