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Supreme Court: महाराष्ट्र सियासी संकट मामले में सुनवाई पूरी, पांच जजों की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखा

Thu, 16 Mar 2023 08:18 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने नौ दिन की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं पर सुनवाई 21 फरवरी से शुरू हुई थी। इससे पहले 17 फरवरी को शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र में जून 2022 में पैदा हुए सियासी संकट संबंधी याचिकाओं को सात न्यायाधीशों की पीठ को भेजने से इनकार कर दिया था।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने महाराष्ट्र राजनीतिक संकट के संबंध में प्रतिद्वंद्वी गुटों उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर ली है। याचिकाओं के एक बैच पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आदेश सुरक्षित रख लिया है।

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प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने उद्धव और शिंदे दोनों गुटों और राज्यपाल के कार्यालय की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा। न्यायमूर्ति एमआर शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की सदस्यता वाली पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, देवदत्त कामत और अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई पूरी की। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल, हरीश साल्वे, महेश जेठमलानी और अधिवक्ता अभिकल्प प्रताप सिंह की दलीलें भी सुनीं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मामले में राज्यपाल कार्यालय की पैरवी की।

पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने नौ दिन की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं पर सुनवाई 21 फरवरी से शुरू हुई थी। इससे पहले 17 फरवरी को शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र में जून 2022 में पैदा हुए सियासी संकट संबंधी याचिकाओं को सात न्यायाधीशों की पीठ को भेजने से इनकार कर दिया था। इनमें 2016 के नबाम रेबिया फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह किया गया था।
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न्यायालय ने 2016 में अरुणाचल प्रदेश के नबाम रेबिया के मामले पर फैसला दिया था कि यदि विधानसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए नोटिस सदन में पहले से लंबित हो, तो वह विधायकों को अयोग्य ठहराने के लिए दी गई अर्जी पर कार्यवाई नहीं कर सकता। दरअसल, 29 जून 2022 को महाराष्ट्र में राजनीतिक संकट चरम पर पहुंच गया था, जब शीर्ष अदालत ने ठाकरे के नेतृत्व वाली 31 महीने पुरानी एमवीए सरकार का बहुमत परीक्षण कराने के राज्यपाल के निर्देश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना-भाजपा सरकार बनी थी।

राज्यपाल का 2022 का आदेश रद्द करने की मांग
इस बीच शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के जून 2022 के आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया, जिसमें मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा गया था। ठाकरे गुट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ से आदेश को रद्द करने की अपील की। इससे एक दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने महज शिवसेना विधायकों के बीच मतभेद होने पर बहुमत परीक्षण का आदेश देने के लिए कोश्यारी के व्यवहार पर सवाल उठाए थे।



सुप्रीम कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि वह महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार को बहाल कैसे कर सकता है, जब सीएम ने शक्ति परीक्षण का सामना करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। उद्धव गुट ने शीर्ष अदालत में दलीलें रखकर राज्यपाल के जून 2022 के शक्ति परीक्षण वाले आदेश को रद्द करने की अपील की थी। 

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पांच सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष ठाकरे गुट के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि इस अदालत के इतिहास में यह एक ऐसा क्षण है, जब लोकतंत्र का भविष्य निर्धारित होगा। मुझे यकीन है इस अदालत के दखल के बिना लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि किसी भी चुनी हुई सरकार को टिकने नहीं दिया जाएगा। मैं अदालत से याचिका को स्वीकार करने व राज्यपाल के आदेश (शक्ति परीक्षण) को रद्द करने की अपील करता हूं। जैसा कि इस अदालत ने 2016 में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में नबाम तुकी को फिर से स्थापित करने का आदेश देकर किया था।

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, 29 जून, 2022 को पूर्व सीएम का इस्तीफा अप्रासंगिक होगा... क्योंकि एक बार राज्यपाल के अवैध कार्य को लागू करने की अनुमति देने के बाद, विश्वास मत का परिणाम एक ज्ञात और पूर्वगामी निष्कर्ष था। तथ्यात्मक रूप से इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी पूर्व मुख्यमंत्री खुद इसके अधीन रहें। पूर्व मुख्यमंत्री की भागीदारी या भागीदारी से अनुपस्थिति किसी भी तरह से उस मौलिक और बुनियादी अवैधता को कम नहीं करेगी।

आप सदन के पटल पर विश्वास मत हार जाते तब यथास्थिति तार्किक होती
सीजेआई ने सिंघवी से कहा कि यथास्थिति एक तार्किक बात होती, बशर्ते आप सदन के पटल पर विश्वास मत हार गए हों। क्योंकि, तब स्पष्ट रूप से आपको विश्वास मत के आधार पर सत्ता से बेदखल कर दिया जाता, जिसमें बाद में शक्ति परीक्षण के आदेश को अलग रखा जा सकता है। यहां बौद्धिक सवाल यह है कि आपने विश्वास मत का सामना नहीं करने का फैसला किया। वकील ने इसे ‘रेड हेरिंग’ (गुमराह करने वाली बात) करार देते हुए कहा, राज्यपाल के शक्ति परीक्षण के लिए बुलाने से पहले मामला शीर्ष अदालत में विचाराधीन था।

ऐसा नहीं है कि सरकारें अल्पमत में नहीं चलीं
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा, अगर शिवसेना के विधायकों का सरकार से भरोसा उठ गया होता तो सदन में जब धन विधेयक लाया जाता तो वे इसके खिलाफ मतदान कर और इसे अल्पमत में ला सकते थे। ऐसा नहीं है कि सरकार अल्पमत में नहीं चल सकती। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव अल्पमत की सरकार चलाते थे। राज्यपाल के पास उन (बागी) विधायकों को मान्यता देने और फ्लोर टेस्ट के लिए बुलाने की कोई गुंजाइश नहीं है। यहां वे (बागी विधायक) चाहते हैं कि सरकार गिराकर मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री बनाएं। उसके लिए राज्यपाल के पद का इस्तेमाल करें। सिब्बल ने कहा, मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता, सब कुछ पब्लिक डोमेन में है।

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