सुप्रीम कोर्ट ने 'गोली मारो' टिप्पणी मामले में अनुराग ठाकुर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने से जुड़े फैसले पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर माकपा नेता वृंदा करात की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर के कथित "गोली मारो" भाषण के मामले में एफआईआर दर्ज कराने से इनकार करने वाले 29 अप्रैल के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि पहले दिए गए फैसले पर दोबारा विचार करने का कोई आधार नहीं बनता। 29 जुलाई को पारित आदेश में पीठ ने कहा, "हमने पुनर्विचार याचिका और उसके समर्थन में दिए गए आधारों का अध्ययन किया है। हमें आदेश में ऐसी कोई त्रुटि नहीं मिली, विशेष रूप से ऐसी कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं, जिसके आधार पर इस पर पुनर्विचार किया जाए।"
खुली अदालत में सुनवाई की याचिका भी हुई खारिज
पीठ ने खुली अदालत में मौखिक सुनवाई के लिए पुनर्विचार याचिका सूचीबद्ध करने की मांग वाली अर्जी भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा, "वर्तमान पुनर्विचार याचिका को खुली अदालत में सूचीबद्ध करने का आवेदन खारिज किया जाता है।" इसके साथ ही पुनर्विचार याचिका और इससे जुड़ी सभी लंबित अर्जियों का भी निस्तारण कर दिया गया।
29 अप्रैल के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने वृंदा करात की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया था। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट और निचली अदालत की उस कानूनी दलील से असहमति जताई थी, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने से पहले पूर्व अनुमति (पूर्व स्वीकृति) को आवश्यक माना गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट की किस दलील पर जताई असहमति?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पूर्व स्वीकृति केवल उस चरण में जरूरी होती है, जब अदालत किसी मामले का संज्ञान लेती है। एफआईआर दर्ज करने या जांच शुरू करने के लिए इसकी आवश्यकता नहीं होती। अदालत ने कहा था कि सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच का निर्देश देना संज्ञान लेने से पहले की प्रक्रिया है और इसे अपराध का संज्ञान लेना नहीं माना जा सकता।
पीठ ने यह भी कहा था कि एफआईआर दर्ज करने को पूर्व स्वीकृति से जोड़ना आपराधिक जांच की वैधानिक व्यवस्था के विपरीत होगा। हालांकि, पूर्व स्वीकृति के मुद्दे पर निचली अदालतों की दलील से असहमति जताने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करने के बाद एफआईआर दर्ज कराने से इनकार करने के अंतिम निष्कर्ष को बरकरार रखा था।
क्या है पूरा विवाद?
29 अप्रैल के फैसले में अदालत ने कहा था कि संबंधित भाषणों, निचली अदालत में दाखिल स्थिति रिपोर्ट और निचली अदालतों के आदेशों का सावधानीपूर्वक परीक्षण करने पर "कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।" यह मामला वृंदा करात की उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने जनवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों को लेकर अनुराग ठाकुर और तत्कालीन भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी।
पुलिस द्वारा शिकायत पर कार्रवाई नहीं किए जाने के बाद करात ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत निचली अदालत का दरवाजा खटखटाया था। निचली अदालत ने यह कहते हुए एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था कि इसके लिए पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था, जिसके बाद वृंदा करात सुप्रीम कोर्ट पहुंची थीं। उच्चतम न्यायालय ने अपने 29 अप्रैल के फैसले में पूर्व स्वीकृति से जुड़े कानूनी पहलू को स्पष्ट किया था, लेकिन अंततः यह कहते हुए एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने से इनकार कर दिया था कि संबंधित भाषणों से किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं होता।